गुरुवार, 6 मार्च 2014




हरी जवानी

हम किसान हन
क्याला के बिरवा जैसी तकदीर
सारी दुनिया पूजै हमका
सत्यनरायन स्वामी के
हमहे मंडप हन
बेफै बेफै लोग हिंया आरती उतारै
पढ़ि पोथी फिरि हमका
सरधा ते अकत्यावें
लोटियन भरि भरि नीरु चढ़ावें
भजन सुनावें
आँखी मूंदि पंडितउनू तब संखु बजावैं
पोथिन मा अपनी इज्जति पर
झूमि-झूमि हरसाई
दिन दूने औ रात चौगुने
फूलि फूलि हरियाई
फूल चढ़ा तौ बतिया आयीं
तिनुक पोढाई
अब तौ फल पर
ललुआ बुधुआ सबही की नजरें ललचाईं
पाहिले गहरि काटि लैगे
फिरि जड़ ते काटेनि
हिलि मिलि कै पूजा का फल
अपनेंन मा बाटेनि
की ते रोई -कौनु सुनी
हमारी यह बिथा किहानी
लूटि चुके हैं गांवै वाले हमारी फसलें
काटि रहे हैं जड़
अबहीं है हरी जवानी |




कोई टिप्पणी नहीं: