रविवार, 15 जून 2014



रमई काका ग्रामीड जीवन की विसंगति के चतुर चितेरे हैं उनकी कबिता देखिए
-छीछाल्यादरि-




लरिकउनू बी ए पास किहिनि, पुतहू का बैरू ककहरा ते।
वह करिया अच्छरू भैंसि कहं, यह छीछाल्यादरि द्याखौ तो।

दिनु राति बिलइती बोली मां, उइ गिटपिट गिटपिट बोलि रहे।
बहुरेवा सुनि सुनि सिटपिटाति, यह छीछाल्यादरि द्याखौ तो।

लरिकऊ कहेनि वाटर दइदे, बहुरेवा पाथर लइ आई।
यतने मा मचिगा भगमच्छरू, यह छीछाल्यादरि द्याखौ तो।

उन अंगरेजी मां फूल कहा, वह गरगु होइगे फूलि फूलि।
उन डेमफूल कह डांटि लीनि, यह छीछाल्यादरि द्याखौ तो।

बनिगा भोजन तब थरिया ता, उन लाय धरे छूरी कांटा।
डरि भागि बहुरिया चउका ते, यह छीछाल्यादरि द्याखौ तो।

लरिकऊ चले असनान करै, तब साबुन का उन सोप कहा।
बहुरेवा लइकै सूप चली, यह छीछाल्यादरि द्याखौ तो। 

प्रस्तुति:भारतेन्दु मिश्र 

3 टिप्‍पणियां:

विभा नायक ने कहा…

Sir , bahut khoob likha hai

विभा नायक ने कहा…

Patrika ka naam hi bahut sundar h. Mujhe yaad aata h ki dadaji mujhe bachpan me son chirayya kahte the. Vhi pyarapan is patrika me bhi hai

भारतेंदु मिश्र ने कहा…

धन्यवाद शेफालिका जी।