गुरुवार, 5 अप्रैल 2018

Amrendra Nath Tripathi  की वाल से-
लोकार्पण, काव्यपाठ और परिचर्चा : कुछ बातें कुछ छवियाँ
कल दिल्ली के Academy of Fine Arts & Literature में अवधी प्रेमियों की उत्साहवर्धक मौजूदगी में पुस्तक ‘समकालीन अवधी साहित्य में प्रतिरोध’ (सं.-अमरेन्द्र अवधिया) का लोकार्पण हुआ। आयोजित संगोष्ठी में पुस्तक पर महत्वपूर्ण चर्चा हुई और कई अवधी कवियों ने प्रतिरोधी स्वर की कविताओं को पढ़ा। आरंभ में साहित्यकार रजनी तिलक और सुशील सिद्धार्थ के असामयिक निधन पर दो मिनट का मौन रखा गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे ख्यातिलब्ध साहित्यकार असग़र वजाहत Asghar Wajahat ने अपने रोचक संस्मरणों के माध्यम से अवधी भाषा, या फिर भाषा की ही, क्या भूमिका होती है, इस पर प्रकाश डाला। पुस्तक पर अन्य वक्ताओं के मतों की अहमियत स्वीकारते हुए, दुहराव से बचते हुए उन्होंने किस्सों-सी रोचकता द्वारा अपना दिलचस्प व्याख्यान प्रस्तुत किया। उनके संस्मरण अपने निष्कर्ष में भाषा की ताकत का अहसास कराते थे। अवधी के महान कवि तुलसीदास के साहित्य पर उन्होंने अपनी राय स्पष्ट की कि उनका साहित्य प्रतिरोध का साहित्य है। यह प्रतिरोध जनपक्षी है। वैसे ही जैसे ईरान में फिरदौसी का साहित्य प्रतिरोध करता है। इसी प्रसंग में उन्होंने अपने तुलसीदास पर लिखे जा रहे नाटक का जिक्र किया और नाटक के दूरदर्शी संवाद का उल्लेख किया जिसमें अकबर की जगह ‘इतिहास’ में तय होती है और तुलसीदास की जगह ‘वर्तमान’ में।
मुख्य वक्ता के रूप में, जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर चंद्रदेव यादव Chandradev Yadav ने कहा कि संकलन की कविताओं की टोन खांटी अवधी की है। और यदि इसमें इतनी पुख्ता जनचेतना है तो इसे जन के बीच आना ही चाहिए। परिवर्तनकामी चरित्र इस संग्रह की कविताओं में है। हर भाषा का अपना तेवर होता है और ये कविताएँ अवधी में ही संभव थीं। कविताओं में ‘फोर्म’ की विविधता की तारीफ करते हुए उन्होंने कहा कि यहाँ एकतरफ़ पद, बरवै, मुकरियाँ, कवित्त, गजल, कुंडलिया, बिरहा जैसे छंद हैं तो दूसरी तरफ़ आधुनिक प्रकार की कविताएँ भी।
दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर आशुतोष कुमार Ashutosh Kumar ने कहा कि अवधी भाषा की कविता बड़ा गंभीर हस्तक्षेप कर रही है। इतनी कविताओं को एक साथ पढ़ना एक रिवीलेशन है। अवधी सहित्य में प्रतिरोध का स्वर निखरा है। यह संग्रह यह बताता है कि भाषा के अपने बहुत सारे शब्द होते हैं जिनकी अपनी संवेदना है और इन भाषाओं का चलन खत्म होने से हम इन शब्दों को खोते हैं। ये कविताएँ आम लोगों की भाषा में हैं। इनका अनुवाद हो तो इनकी धार ख़त्म हो जाती है। इस संकलन में कमज़ोर कविताएँ बहुत कम हैं।
कार्यक्रम का संचालन कर रहे प्रख्यात आलोचक बजरंग बिहारी तिवारी ने छुटपुट टिप्पणियों में महत्वपूर्ण बातें कहीं। उन्होंने कहा कि लोक अराजनीतिक नहीं होता। लगे भले। रामचरित मानस में मंथरा जहाँ कहती हैं कि ‘कोउ नृप होय हमैं का हानी’, उसके तुरंत बाद एक बड़ा राजनीतिक उलटफेर होता है जिसमें उनकी बड़ी भूमिका है। बजरंग जी ने कहा कि अवधी में बाज़ार का प्रवेश नहीं हुआ है। उन्होंने यह भी कहा कि लोक हिंसक शक्तियों की पहचान अपने ढंग से कर लेता है, ये कविताएँ इस बात को बताती हैं। इस बात को देखने का झरोखा हैं ये कविताएँ।

अर्थशास्त्री अजय रंजन ने कहा कि ‘मनी’ एक सोशल फोर्म है, सोसाइटल डिवाइस है, केवल आदान-प्रदान करने का जरिया नहीं। नोटबंदी के कारण पारिवारिक रिश्तों में, या सामाजिक रोश्तों में, बदलाव करने की कोशिश की गयी है। उसी तरह जैसे नसबंदी या आपात्‌काल के दौरान ऐसी कोशिश की जा चुकी है। पैसे का अपना सामाजिक जीवन होता है। सत्ता इसे पहचान कर लोगों के पेशे में हस्तक्षेप करके उन्हें मजदूर बना देती है। संग्रह की एक कविता का उन्होंने जिक्र किया - ‘तब तो रहय नसबंदी / अबकी हय नोटबंदी’।
जानकी देवी कॊलेज-डीयू की डॊ. सुधा उपाध्याय सुधा उपाध्याय का अवधी में वक्तव्य देने का ढंग बड़ा रोचक रहा। उन्होंने कहा कि अवधी बोली नहीं लोकभाषा है। अवधी में बड़ा रचा-बसा संसार है जो सजग है। विचारों के उन्नयन के लिए राजनीतिक पैठ जरूरी है, जोकि अवधी कविता में मिलती है। इस दृष्टि से उन्होंने तुलसी कृत रामचरितमानस की अहमियत रेखांकित की। उन्होंने इस बात की ओर भी इशारा किया कि कविता आंदोलनधर्मी होनी चाहिए लेकिन वह इश्तहार का उपकरण भर न बने।
स्वामी श्रद्धानंद कॊलेज-डीयू के डॊ. टेकचन्द Tekchand Du ने कहा कि लोक में प्रतिरोध और प्रतिपक्ष ज्यादा दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि कुलीन कविता में इतनी शक्ति नहीं होती कि वह इसे दर्ज करे। जहाँ टकराव की बात आती है वहाँ लोक शैली ही काम करती है। यह सब इस संकलन की कविता में देखा जा सकता है। इन कविताओं को आने वाले चुनावों में नारे के रूप में जन-जन तक फैलाया जाय। उन्होंने कहा कि राष्ट्रभाषा को रस देने का काम लोकभाषा ही करती है।
पुस्तक के संपादक डॊ. अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने पुस्तक से संबंधित कुछ जिज्ञासाओं का जवाब दिया और कहा कि आगे भी इस तरह के संकलन लाने की योजना रहेगी।
कार्यक्रम में अवधी कविताओं के पाठ का भी एक सत्र रखा गया था जिसमें डॊ. भारतेन्दु मिश्र Bhartendu Mishra , मृदुला शुक्ला Mridula Shukla, ममता सिंह Mamta Singh, अमित आनंद अमित आनंद, बृजेश यादव Brijesh Yadav, अटल तिवारी Atal Tewari, विष्णु वैश्विक विष्णु 'वैश्विक' आदि ने कविताएँ पढ़ीं। लंबे समय से दिल्ली में रह रहे अवधी साहित्यकार भारतेन्दु मिश्र ने कहा कि पिछले बत्तीस वर्षों में मैं पहली बार अवधी को लेकर इतनी सार्थक बातचीत और कार्यक्रम को देख रहा हूँ।
वरिष्ठ कवि मिथिलेश श्रीवास्तव Mithilesh Shrivastava की मौजूदगी से कार्यक्रम और समृद्ध हुआ। श्रोताओं से भरे हुए सभागार को देख कर सभी को खुशी मिल रही थी। लोकभाषा के, अवधी के, प्रेमियों का उत्साह देखने लायक था। कार्यक्रम में पुस्तक के प्रकाशक, परिकल्पना प्रकाशन के, शिवानंद जी Shivanand Tiwari भी उपस्थित थे। अंत में डॊ. नीरज कुमार मिश्र Neeraj Mishra ने सबका धन्यवाद ज्ञापन किया।
[ रपट : देवेश कुमार ]

शनिवार, 17 मार्च 2018


बेचैनी तो बनी रहेगी,सुशील भाई











(2/7/1958 -17 /3/2017)
कितना अनकहा छोड़ गए सुशील भाई,दिनांक 17  मार्च 2018 सुबह भाई विवेक मिश्र से फोन पर बात के बाद सुशील सिद्धार्थ के अचानक चले जाने का समाचार मिला|मन विचलित है सहसा विश्वास ही नहीं हुआ| पिछले चालीस वर्ष किसी फिल्म की तरह नाच रहे हैं|सन 1977 से लेकर अब तक  सुशील भाई के अनेक रूपों से साक्षात्कार होता रहा| सुशील भाई, हमेशा  छोटे बड़े रचनाकारों की नाक - मुंह पोंछ उन्हें साहित्यकार के रूप में स्थापित करने की कवायत में अपना जीवन दांव पर लगाते रहे| फ्रीलांसिंग का संघर्ष आमरण उसे लिखते रहने के लिए बाध्य करता रहा,और वो बस दिन रात लिखता ही रहा | अपने मौलिक के रूप में कुछ व्यंग्य और कुछ कवितायें ही प्रकाशित करा पाए बाकी दूसरो के लिए ही लिखते हुए चले गए|
जुलाई 1977 में बीए प्रथम वर्ष की कक्षा में हम दोनों पहले पहल मिले|बहसों और गंभीर युवा मानसिकता की बातों में वाद विवाद के बीच हमारी मुलाकातें निकटता में बदलती गयीं| हम दोनों अतुल अनजान की सभाओं में भी एक साथ होते थे|मुझे याद आता है उन दिनों लखनऊ वि.वि. का विशाल टैगोर पुस्तकालय,जिसके विशाल वाचनालय में हम लोग बैठकर कबीर तुलसी और निराला,प्रसाद और मुक्तिबोध के बारें में बातें किया करते थे| दोबीघा जमीन,फागुन और गर्महवा जैसी फ़िल्में भी हम दोनों ने तभी एक साथ देखी थीं|तब अनेक उपयोगी किताबें पुस्तकालय से लेकर ही पढ़ने का अवसर  मिल पाता था|हम दोनों ने बी.ए. एक साथ किया था|इसी दौरान  हम एक साथ ही हजारीप्रसाद द्विवेदी,अमृतलाल नागर,शिवमंगल सिंह सुमन और रमई काका जैसे साहित्यकारों से भी मिले थे|उनदिनों प्रो.हरिकृष्ण अवस्थी जी हिन्दी के विभागाध्यक्ष थे| पेन कागज़ लेकर विद्वानों लेखकों के विचार सुनने के लिए हम लोग तत्पर रहते थे|ऐसे आयोजन तब अक्सर विश्वविद्यालयों में होते थे|सुशील भाई के पिताश्री डीएवी. कालेज में हिन्दी के ही प्राध्यापक थे इसलिए सुशील भाई का परिचय क्षेत्र उस समय भी बहुत व्यापक था|अद्भुत प्रतिभाशाली तो सुशील जी थे ही|पूरा नाम सुशील कुमार अग्निहोत्री था किन्तु एम ए .के बाद उन्होंने अपना उपनाम सिद्धार्थ रख लिया था|1980 में सुशील ने विभाग में सर्वोच्च अंक लेकर स्वर्ण पदक जीता था|वो लगातार अपने को प्रमाणित करता जा रहा था|हालांकि मैं संस्कृत में एम ए.करने लगा किन्तु हमारी मुलाकातें लगातार होती रहीं|हिन्दी और संस्कृत दोनों विभाग आमने सामने होने के कारण हमारी बतकही और चर्चा में और इजाफा ही होता रहा| अब हम प्रतिद्वंदी न होकर अच्छे पारिवारिक मित्र बन चुके थे|इसीबीच कुछ तुकबन्दियाँ भी हम लोग करने लगे थे| आशा अग्रवाल के साथ मिलकर 1981 में सुशील भाई ने पहली पत्रिका ‘संकल्प’का संपादन किया|उसके प्रवेशांक के लिए मुझे लिखने के लिए कहा मैंने कालिदास पर लेख लिखा था| वह मेरा पहला ही लेख था जो सुशील भाई ने मुझ से लिखवाया था|ऐसे ही अनेक मेरे समकालीन मित्रों को कवि  लेखक बनाने के लिए सुशील भाई प्रेरक की भूमिका निभाते रहे | ‘संकल्प’ के एक दो और अंक निकले फिर वह बंद हो गयी |घर वालों की सहमति के बिना ही इसी बीच आशा जी से उनका प्रेम विवाह हुआ| जीवन और संघर्ष आगे बढ़ता रहा|मेरी प्रारंभिक हिन्दी अवधी की कवितायेँ भी सुशील भाई के प्रयास से ही पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई|वर्ष 1986 में  मैं नौकरी के सिलसिले में दिल्ली आ गया| सुशील भाई संघर्ष करते रहे| गुरुवार प्रो.सूर्यप्रसाद दीक्षित जी के विद्यार्थी होने के बावजूद सब प्रकार से योग्य होते हुए भी उसे कालेज या विश्वविद्यालय में नौकरी नहीं मिल पायी यह विडम्बना ही रही |प्रारंभ में वो अन्य छोटी नौकरी करना ही नहीं चाहते थे बाद में खिन्नता और किसी स्तर तक आत्महीनता और कुंठा का बोध उन्हें लगातार पीड़ित करता रहा|उन दिनों कई वर्षों तक दीदी प्रो.कैलास देवी सिंह जी ने सुशील भाई को हर प्रकार से सहयोग करते हुए संभाला| लखनऊ वाला सुशील भाई का पता और बिरवा का पता भी दीदी कैलास देवी सिंह जी के घर का ही पता था|


वर्ष 1989 में सुशील ने अवधी की पत्रिका ‘बिरवा’ निकाली तब फिर मुझे अवधी में लिखने को कहा| उन दिनों उन्होंने लखनऊ के पुरनिया स्थित अपने घर में ही प्रेस लगा लिया था|हिन्दी पत्रकारिता और लेखन से जीवन यापन की कठिन कल्पना को ही सुशील भाई ने अपना मार्ग चुन लिया|हतप्रभ करने वाली वाक्पटुता,गंभीर और सामान्य विषयों पर सटीक टिप्पणी करने वाले लेखक की उसकी छवि हिन्दी के अनेकानेक बाहुबलियों को आकर्षित और चकित करती रही| इतनी कुशलता के बावजूद हिन्दी लेखन के माध्यम से जीविकोपार्जन करते हुए सुशील भाई ने अपना पूरा जीवन उनसठ साल नौ महीने में ही जी लिया| कमलेश्वर जी सुशील भाई के लेखन से ही प्रभावित होकर उन्हें सीरियल लिखने के लिए मुम्बई ले गए थे|’तद्भव’ ‘कथाक्रम’ ‘लमही’ जैसी अनेक पत्रिकाओं के प्रारंभिक अंक सुशील भाई के परिश्रम से ही निकले थे|रवीन्द्र कालिया उन्हें दिल्ली लाये तो कहीं न कहीं मूल में सुशील की प्रतिभा ही थी| लेकिन सुशील भाई जीवन की गणित हल करते हुए नई राह खोजते रहे ,चतुर सुजान की तरह जिस डगर पर आगे बढे वहां कुछ नया करने की कोशिश में उसे छोड़ दिया उधर दुबारा नहीं मुड़े| अक्सर बिलावजह अपने ही सगे संबंधियों, हित चाहने वालों को अपना शत्रु भी बना लिया| जीविकोपार्जन के लिए लगातार लिखना उसकी मजबूरी थी कुछ माध्यम दर्जे के संपन्न लेखक उसकी इस मजबूरी का लाभ भी उठाते रहे| हालांकि अब उसके पास काम की कमी न थी लेकिन शरीर और स्वास्थ्य कहीं शिथिल हो रहा था| रक्तचाप और मधुमेह तो खानदानी था ही लेकिन वो सोचते रहे कि इस बीमारी को भी इसी प्रकार संघर्ष और जिद से जीत लेंगे परन्तु हमेशा वैसा कहाँ होता है जैसा मनुष्य सोचता है| 
तुम तो ह्रदय गति रुकने से हमें छोड़ गए लेकिन शताधिक युवा लेखकों को प्रेरित और प्रभावित करने वाले मित्र सुशील सिद्धार्थ को आज अलविदा कहने का साहस नहीं जुटा पा रहा हूँ|अब तो विकल मन बस तुम्हे लेकर रो रहा है|दिल्ली में तुम दस वर्ष रहे,उसमें से एक वर्ष तो हम साथ भी रहे लेकिन अपने काम की धुन में तुमने वैसा संवाद करने और लड़ने का एक भी मौक़ा नहीं दिया|ये बेचैनी तो सदा बनी ही रहेगी|काश तुम देख पाते कि जाने कितने मेरे जैसे तुम्हारे चाहने वाले दोस्त आज दुखी और निराश हैं|


इतनी जल्दी त्रिधारा की एक धारा सूख जायेगी यह अनुमान नहीं था|  'अवधी त्रिधारा' (सं.डॉ.रामबहादुर मिश्र) में संकलित सुशील भाई का एक गीत उनके जीवन की वास्तविकता का पता दे रहा है,मानो सुशील जी को कलेजे में चूहे लग जाने और उसके छलनी हो जाने का बोध पहले ही हो गया था-
धंधा न पानी
कैसे गुजर अब होई अइसे गुजरिया
धंधा न पानी|
सूनी परी है जैसे सारी नगरिया
धंधा न पानी||
आपनि बिथा हम रोई पथरन के आगे
हमरे करेजे मइहाँ मुसवा हैं लागे
झांझर परी है हमरे मन की चदरिया
धंधा न पानी ||
कारी अंधेरिया दउरै लै लै कै लाठी
लकड़ी कै घोड़वा लादे लोहे कै काठी
हमारे करम  मा  नाहीं कउनौ उजेरिया
धंधा न पानी||
हउसन प पाला परिगे सपना झुराने
सातिर सिकारी द्याखौ बैठे मुहाने
का जाने अब को लेई हमरी खबरिया
धंधा न पानी||

सोमवार, 12 मार्च 2018


(लघु कथा)

मिठुआ सुर
# भारतेंदु मिश्र

प्रोफ़ेसर किरपासंकर दिल्ली विश्वविद्यालय म पढ़ावति रहै | मेट्रो ते उनका रोजु आना जाना रहै| वाही दिन उनके बगल कि सीट पर एमफिल. के दुइ चंट बिद्यार्थी बैठ रहैं, उनमा याक चटकि बिटवा रही दूसर वाहिका दोस्त मुरहंट लरिकवा रहै |दुनहू लपटति –चपटति गपुवाय लाग| प्रोफ़ेसर अपने थैले ते याक कितबिया निकारि के पढ़ै क नाटक करै लाग|उनकी नजर किताब म रहै मुला कान रिसीवर बनिगे रहै |वैसी बगल म दुनहू अपनी लीला मा मगन रहैं|प्रोफ़ेसर उनकी तरफ देखे बिना उनकी सब बातैं सुनत रहे|लरिकवा अपनी दोस्त ते कहेसि - ‘यार,सिनाप्सिस वाली प्रोबलम साल्व करा दे|’
‘अभी तेरी सिनाप्सिस नहीं बनी?’
‘ठहर, अभी ले... रिक्वेस्ट डालती हूँ|’
‘कहाँ..?’
‘अरे वो सनकी प्रोफ़ेसर शर्मा है ना,जो पिछले महीने रिटायर हुआ है.. ..वो लड़कियों को बहुत अच्छा रिस्पांस करता है|’
बगल म बैठ किरपासंकर अब और ध्यान ते उनकी बातैं सुनै लाग |
‘हम फोन किये रहेन,वो चिरकुट फोन नहीं उठायेसि ...|’लरिकवा कहेसि |
‘चुप,घंटी जा रही है|’
‘हेलो!.सर मैं रुपाली,..सर मेरा दोस्त ‘कबीर की भाषा’ पर काम कर रहा है|...तो उसे सिनाप्सिस जमा करनी है..सर ! कुछ प्वांट्स वाट्सेप कर दीजिए ना ?..कल सम्मिट करनी है सर| आप जब से रिटायर हुए है न सर, आप जैसा कोई दूसरा टीचर विभाग में नहीं बचा जो हम विद्यार्थियों की मदत करे|..प्लीज सर!...|’
‘क्या कहा सनकी ने?’
‘शाम तक हो जाएगा...मिठुआ बोली के जादू से सब काम हो जाते हैं..|मैं तो ऐसे ही मिठुआ सुर लगाती हूँ और घर बैठे अपने सब असाइंमेंट सनकी से वाट्सेप करा लेती हूँ| ठरकी बुड्ढों को चारा फेंकने से ...’
‘.....थोड़ा चारा मेरे लिए भी...बचा के रखना|’
प्रोफेसर किरपासंकर के कान खड़े हुइगे ,वुइ अपने फोन पर आये तमाम बिटेवन के ई तना कर रिक्वेस्ट डिलीट करे लाग|
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शुक्रवार, 9 मार्च 2018

. उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा गत दिनों  पुरस्कृत की गयी ,अनेक अवधी उपन्यासों , कहानियों और कविताओं की रचनाकार,डॉ ज्ञानवती दीक्षित की जानिब से ....
.( अवधी किस्सा )....

      "मुआवजा"


डॉ .ज्ञानवती दीक्षित : अवधी लेखिका 

बरसन बाद रामनगर लौटे हन. नौकरी केरी बंदिस देस के अलग-अलग सहरन मां लइ जाति रही. यहि क्रम मां आपन गाँव कहूँ पीछे छूटत गा. अब तौ पता नाय बरसन पहिले देखे चेहरा पहिचाने जइहैं या नांय. जैसेन गाँव जाय वाली पगडंडी पर मुड़ेन– एक अबूझ आवेग तेरे हृदय धड़कै लगा. हमार गाँव– पियारा गाँव– जहाँ केरी माटी हमरी सांसन मां महकत है– जहाँ केरा एक-एक पेड़ हमार पहिचाना है . आय गए हन हमरे पियारे गाँव–
आय गए हन तुमसे मिलै के लिए. हमार आँखी भरि आयीं.
सामने लछिमी काकी केरा घर रहै . अरे यौ एतना टूटि-फूटि गा. कबहूँ यौ गाँव केरा सबसे खूबसूरत घर हुआ करति रहै. हरी-भरी फलिन केरी बेलन से ढका, माटी से लीपा-पोता, चीकन-चमचमात घर. माटी से बने कच्चे घर केतने खूबसूरत हुइ सकत हैं—-यहिका उदाहरन रहै लछिमी काकी केरा घर . बड़ी मेहनती रहै लछिमी काकी. भोरहें से सफाई मां जुटि जातीं. उनकी धौरी गइयौ उतनै साफ़-सुथरी रहती रहै, जेतना गोबर से लीपा उनका आँगन. घर के समुंहे खूब साफ- सुथरा रहत रहै. हम बच्चा लोग हूंआ खेलै जाई, तौ धौरी गइया केर बढ़िया दूधौ पियैक मिलत रहै. कबहूँ काकी मट्ठा बनउतीं, तौ ताजा लाल- लाल मट्ठौ पियैक मिलत रहै. गाँव केरे दूध, दही अउर मट्ठे केरा स्वाद तौ गाँवै वाले जानि सकत हैं. सहरन मां वहिकी कल्पनौ दुस्कर है.
हम धीरे से आवाज दिहेन– काकी- – –
अंदर से कांपत भई आवाज बाहर आई, खांसी के धौंसा के साथ– कउन है?
— हम हन, काकी. अर्जुन- – -.
हमार दिल धड़कि उठा . हमरे सामने मूर्तिमान दरिद्रता खड़ी रहै– फटे-पुरान कपड़ा, चेहरा पर असंख्य झुर्री– मानौ सरीर के हर अंग पर रोग कब्जा कै लिहिन होय . लछिमी काकी केरा अइस हाल होइगा ?
वा पहिले केरी सम्पन्नता कहूँ देखाय नाय परत है. घर केरी खस्ता हालत दूरि से आपन परिचय दै रही रहै.
— अर्जुन हौ ? रामचन्न दद्दा के लरिका ?
बूढ़ी कोटरन मां धंसी आंखी हमार बारीक पर्यवेक्षण कै रही रहैं.
—हाँ ! काकी .
हमरे मुँह से सब्द जैसे कठिनाई से रस्ता बनाय पाय रहे रहै .
—तुम्हार अइसन हाल काकी ? घर मां सब कहाँ गे ? औ सरद कहाँ है ?
— तुम्हरे काका के साथै , सब बिलाय गा, बचुआ.
काकी धम्म से आँगन मां परे पुरान तखत पर बैठि गईं. बरसा मां भीजि के तखत केरी लकड़ी फूलि आई रहै .
—बड़ा फूला-फला रहै यौ आँगन कबहूँ. आजु खाली हुइगा बचुआ. तुम्हरे काका के आंखि मुंदतै सारा जहान बैरी हुइ गवा. सरद का पुलिस पकरि लै गई …. ऊ .. जेल्ह मां है बचुआ .
काकी आँचर से आँखी पोंछइ लगीं .
— जेल मां ??? काहे ?? का किहिस ऊ….?
— कुछ किहिस होत तौ का गम रहै…. बचुआ.. ? निरपराध हमार लरिका जेल्ह मां बंद है . सूबा मां अइसी सरकार है भइया, जौ दलितन की बहू-बिटियन के साथ कुछ होइ जाय ऊँच-नीच, तौ हजारन केरा मुआवजा बाँटत है. गाँव मां हरिजन टोला मां अब रोज केरा तमासा होइ गवा है. हल्ला मचाय के कोई सवर्ण का फंसाय देव. कोई सुनवाई नाय. तुरतै हरिजन एक्ट लागि जात है. सिकायत करइ वाली का मुआवजा दीन्ह जात है. हमार सरद — बेवा केरी अकेल औलाद रहै— उनकी पइसन केरी हवस केर नेवाला बनिगा . हमार सवर्ण होब गुनाह होइगा बचुआ. हमरे साथ खड़ा होवइया कोई नाय रहै. कोई जांच, कोई फ़रियाद नाय सुनी गई. हमार मासूम लरिका, जौ कोई गाँव केरी मेहरुआ की ओर आँखी उठाय के देखतौ नाय रहै—ऊ… जेल्ह मां सरि रहा है — बलात्कार केरे आरोप मां.
लछिमी काकी आँखिन पर आँचर धरि के रोवै लागीं. हम अवाक खड़े रहि गेन. यहु हमार वहै गाँव रहै– जहाँ केरी बहू-बेटी दुसरे गाँव मां ब्याही होतीं तौ बड़े-बुजुर्ग वै गाँव केरा पानी नांय पियत रहैं, कि लडकियैं तौ गाँव भर की सांझी बिटिया भई. वै गाँव मां अइसा घटै लगा पइसन के लिए? तौ का तालाब केरा पानी गंदी राजनीति केरी लाठी से फटिगा …? यहै संविधान रचा गा रहै, हमरे देस केरे लिए ..?
बूढी काकी केरी हिचकियैं हमरे बेजान कदमन केरा पीछा कै रही रहैं. हम धीरे-धीरे चलत भये गाँव केरा गलियारा पार कियेन. सामने हरिजन टोला रहै. धुत सराब पिए भैंरों काका जमीन पर लुढके पड़े रहैं. पास मां काला कुत्ता बइठा पूंछ हिलाय रहा रहै. दुइ किसोरी सिर पर घड़ा लिए पानी लेय जाय रही रहैं. छप्पर के अंदर से कोई मेहरुआ गन्दी-गन्दी गारी दै रही रहै. गारिन के साथ-साथ वहिके घर से मारापीटी की आवाजौ आय रही रहै. ई मारपीट मां छः सात छोटे बच्चा बिलखि-बिलखि के रोय रहे रहैं. पासै बजबजात, कूड़ा से पटी नाली रहै, वहे नाली मां एक सराबी लुढका पड़ा रहै. वहिके ऊपर माछी भिन-भिन करि रहि रहैं. हम राम सुमिरन का बड़ी मुश्किल से पहिचानेन. वौ हमरे साथ पढ़त रहै, अपरिचय के भाव लिए ऊ पास आवा. सिर के बाल खिचड़ी होइगे रहैं. चेहरा पर आश्चर्य के भाव रहैं.
—अरे! बाबू जी, आप ?
— का बाबू जी, बाबू जी कै रहा है….. अरे! हमहन अरजुन- – .हम हंसिके कहेन .
—आव, घरै चलौ.
ऊ सकुचात भवा बढ़ा. चारपाई पर बैठत-बैठत हम देखेन ऊका घर पक्का बनिगा रहै. बाहर हैंडपंपौ लगा रहै.
—और सुनाव का हाल है ?
—हाल देखि तौ रहे हौ, भैया. नाली मां पड़ा है . यहु मुरारी है . भैंरों कक्का केरा लरिका . पीके नाली मां परा है हरामी. गाँव के पंडित टोला के लरिका पर अपनी बिटिया से मुकदमा कराय दिहिस….. बलत्कार कर. मुआवजा मिला है. हैलीकाप्टर से पुलिस के बड़े साहब आये रहैं. दै गे हैं. बस! दारू मुरगा उड़ि रहा है दूनौ बखत…..
—का कहत हौ …? झूठै…?
—अरे भइया!!!!!! पइसे के लिए का-का नाय होत है हियां. महिमां तौ खाली रिपोट लिखवावै की है. एस० ओ० हरिजन है. आधा-आधा पइसा बटिगा ….पब्लिक पुलिस केर पुरान रिलेसन.
राम सुमिरन केरी आवाज दुःख मां डूबी रहै.
—तौ तुम इनका समझावत काहे नांय ? तुम तौ पढ़े-लिखे हौ…
—हमरे कहै से कोई काहे सुनै और मानै ..? हम मेहनत करइक कहित है… जब हराम केरा मिलि रहा है, तौ मेहनत को करी. एक-एक मेहरुआ केरे आठ- आठ , नौ-नौ लरिका हैं, एतनी योजना चलि रही हैं, आबादी बढाए जाव बस!
हम गाँव से निकरेन तौ मन बहुत दुखी रहै. का होइगा है हमरे प्यारे गाँव का…? पहिले कइस भाईचारा रहै …? अदब , लिहाज, शर्मोहया सब नष्ट होइगा. घर पंहुचेन तौ लड़िका-बच्चा घेरि लिहिन.—
—पापा! पापा! गाँव से हमरे लिए का लाएव?
का बताइत, का लइके आयेहन. मन बहुत दुखी रहै. सोचेन टी० वी० देखी. टी० वी० खोलेन तौ आगी केरी लपटन मां धधकत एक घर देखाई पड़ा. कुछ गुंडा कूदि-कूदि के आगी लगाय रहे रहै. नेपथ्य से उदघोषक केरी आवाज आय रही रहै—– “जी हाँ! यह वही घर है…. जहाँ पं० जवाहर लाल नेहरू रहा करते थे……. जब वे पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष थे. आज वर्त्तमान अध्यक्ष के बयान से क्रुद्ध होकर सत्ताधारी दल के समर्थकों ने इसे फूँक दिया है. अध्यक्ष को हरिजन एक्ट के तहत गिरफ्तार कर जेल में ठूंस दिया गया है. विरोध प्रदर्शन जारी है….”
हम टी० वी० बंद कै दियेन. सामाजिक परिवर्तन, न्याय, और समानता केरे नाम पर नई-नई पार्टी खड़ी भई हैं. हम सोचि रहे रहन इनका लोकतंत्र केरे कौने अध्याय मां पढ़ावा जाई ..??

# डॉ० ज्ञानवती दीक्षित
प्राचार्या
आर्य कन्या  इन्टर कालेज,सीतापुर

शनिवार, 10 फ़रवरी 2018

 अवधी सम्राट जनकवि :वंशीधर शुक्ल
# डॉ.भारतेंदु मिश्र

                                                                 (जन्म: 1904; मृत्यु: 1980)
‘कदम कदम बढ़ाये जा /खुशी के गीत गाये जा
ये जिन्दगी है कौम की तू कौम पे लुटाये जा|’
-जैसे लोक विख्यात कौमी तराने लिखने वाले कवि का जन्म वर्ष 1904 में वसंत पंचमी के दिन हुआ|इनके पिता पं॰ छेदीलाल शुक्ल सीधे-सादे सरल कवि ह्रदय किसान थे जो अच्छे अल्हैत के रूप में विख्यात थे और आसपास के क्षेत्र में  वे आल्हा गायन के लिए आदरपूर्वक बुलाये  जाते  थे । तब वे किशोर  वंशीधर को भी अपने साथ ले जाया करते थे। पिता द्वारा ओजपूर्ण शैली में गाये जाने वाले आल्हा को वंशीधर मंत्रमुग्ध होकर सुनते थे। सामाजिक सरोकारों से वंशीधर जी के लगाव के पीछे उनके बचपन के परिवेश का बहुत बड़ा योगदान था। सन 1919  में पिता पं॰ छेदीलाल चल बसे। 15 वर्षीय   वंशीधर पर पारिवारिक जिम्मेदारियों का भी बोझ आ गया  था। यह उनके लिए कड़े संघर्ष का समय था। अवधी और खड़ीबोली हिन्दी में एक साथ जन जीवन की कविताई करने वाले पंडित वंशीधर शुक्ल बीसवीं सदी  के उन चंद कवियों में से एक हैं जिनका जीवन उनकी ही कविताओं की तरह ईमानदारी से देखा परखा जा सकता है|अर्थात जिनके मन वचन और कर्म में कोई अंतर नहीं दिखाई देता| वे सच्चे स्वतंत्रता सेनानी और किसान कवि  थे और अंत तक किसानों के स्वाभिमान के लिए संघर्ष करते रहे| साम्राज्यवादी ताकतों के प्रतिनिधि सामंतों और नेताओं से भी उनका लगातार संघर्ष चलता रहा| स्वतंत्रता संग्राम में वे उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी  जनपद के नायक के रूप में उभरे| इसी समाज में जहां बलभद्र प्रसाद दीक्षित ‘पढीस’ जैसे विख्यात अवधी के कवि जनमे उसी परिवेश में उनके उत्तराधिकारी के रूप में वंशीधर जी का जन्म हुआ| ख़ास बात यह कि वंशीधर जी की कवितायेँ हास्य - परिहास अथवा मनोरंजन की दृष्टि से नहीं लिखी गयीं बल्कि उनकी कविता का स्वर आक्रोश और करुणा से परिपूरित है| वे सही मायने में अपने समाज को अपनी कविताओं से जगाना चाहते हैं|उनकी क्रांतिकारी चेतना की कवितायेँ कोटि कोटि जन जन का कंठ हार बनीं|प्रारंभ में वे सीतापुर के नैमिषारण्य तीर्थ स्थल  के अमावस्या के मेले में गा गाकर पुस्तकें बेचते थे|तभी उन्होंने ‘मेला घुमनी ’और ‘चुगल चंडालिका ’ जैसी लघु पुस्तकें लिखीं ये पुस्तकें 10 या 12 पैसे की होती थीं और मेले में खूब बिकती थीं|इसी क्रम  में  - ‘कृषक विलाप ’और ‘मतवाली गजल ’ जैसी पुस्तकें लिखीं| यदा  कदा  उन्हें पुस्तक बेचने के सिलसिले में कानपुर जाना पड़ता था | इन्ही दिनों कानपुर में वे गणेशशंकर विद्यार्थी जी के संपर्क में आये| अब वे पुस्तक विक्रेता की अपेक्षा कांग्रेस के वालेंटियर बन गए थे| गणेशशंकर विद्यार्थी जी से संपर्क केबाद उनके ही आदेश से शुक्ल जी ने ‘खूनी पर्चा ’नामक क्रांतिकारी कविता लिखी|वर्ष 1926 में यह उनकी कविता कोटि कोटि जन तक पहुँच गयी थी|इसी वर्ष कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पास हो चुका था|चारो ओर क्रान्ति की रणभेरी बज रही थी|लखीमपुर में शुक्ल जी के साथी बम बनाने के आरोप में जेल चले गए तब इन्होने जनपद की क्रान्ति की मशाल को आगे बढाया|इन्हें भी पकड़ा गया और क्रांतिकारी साहित्य के प्रचार प्रसार के जुर्म में इन्हें भी 6 माह की जेल हुई|तब जेल से ही शुक्ल जी ने अपने बड़े भाई को कविता में पत्र लिखा-
धैर्य धरो जेलर ससुर की सुता के साथ
चंद दिन में ही तो स्वराज लिए आते हैं|
सन 1925 से पहले ही शुक्ल जी अपनी कविताई के लिए विख्यात हो चुके थे|इसी वर्ष लिखी उनकी कविता कोटि कोटि जन मानस के लिए जागरण गीत साबित हुई | ‘उठ जाग मुसाफिर’ शीर्षक जागरण गीत भी उन्ही का लिखा हुआ है जो महात्मा गांधी जी की प्रार्थना सभा में,प्रभात फेरियों में  और जेल में बंद हजारों स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों द्वारा प्रतिदिन गाया जाता था | स्वाभाविक है कि सन 1925 में लिखे इस गीत से ही शुक्ल जी का साहित्यकारों में मान सम्मान भी बहुत बढ़ गया था-
उठ जाग मुसाफ़िर भोर भई
अब रैन कहा जो सोवत है
जो सोवत है सो खोवत है
जो जागत है सो पावत है
उठ जाग मुसाफ़िर भोर भई
अब रैन कहा जो सोवत है
तू नींद से अंखियां खोल जरा
पल अपने प्रभु से ध्यान लगा
यह प्रीति करन की रीति नही
जग जागत है तू सोवत है

तू जाग जगत की देख उडन,
जग जागा तेरे बंद नयन
यह जन जाग्रति की बेला है
तू नींद की गठरी ढोवत है

लडना वीरों का पेशा है
इसमे कुछ भी न अंदेशा है
तू किस गफ़लत में पडा पडा
आलस में जीवन खोवत है

है आज़ादी ही लक्ष्य तेरा
उसमें अब देर लगा न जरा
जब सारी दुनियां जाग उठी
तू सिर खुजलावत रोवत है|
दूसरी ओर सन 1930 में लिखा शुक्ल जी का निम्नलिखित गीत कैप्टन रामसिंह द्वारा किये गए अपेक्षित परिवर्तनों के बाद सुभाष चन्द्र बोस जी की आजाद हिन्द फ़ौज का मार्चिंग सांग बना “  कदम-कदम बढायें जा खुशी के गीत गाये जा जैसी कालजयी रचना का सृजन करने वाले वंशीधर शुक्ल हैं। हालाकि बाद में इसी मुखड़े को लेकर एक गीत कैप्टन रामसिंह द्वारा आजाद हिन्द फ़ौज के लिए भी लिखा गया था|इन दोनों गीतों में मुखड़ा तो एक ही है लेकिन बीच के अंतरे अलग अलग हैं| बाद में आजाद हिन्द फ़ौज का यही मार्चिंग सांग बना| -
क़दम क़दम बढाए जा
ख़ुशी के गीत गाए जा
ये ज़िन्दगी है क़ौम की
तू क़ौम पर लुटाए जा ।
उड़ी तमिस्र रात है, जगा नया प्रभात है,
चली नई ज़मात है, मानो कोई बरात है,
समय है मुस्कराए जा
ख़ुशी के गीत गाए जा
ये ज़िन्दगी है क़ौम की
तू क़ौम पर लुटाए जा ।
जो आ पडे कोई विपत्ति मार के भगाएँगे,
जो आए मौत सामने तो दाँत तोड़ लाएँगे,
बहार की बहार में,
बहार ही लुटाए जा ।
ऐसी प्रखर राष्ट्रीय रचनाशीलता वाले कवि वंशीधर शुक्ल जी का मान बढ़ता जा रहा था|देश में विभाजन की दीवार उठने लगी थी| ऐसे बहुत कम कवि हुए हैं जिनकी कविताओं की व्याप्ति नरम दल वाले गांधीवादी स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों और क्रांतिकारी गरमदल वाले सेनानियों में सामान रूप से रही हो|कौमी गीत बहुत से लिखे गए लेकिन इस कौमीगीत की बात ही कुछ और है| उनकी इन रचनाओं से यह प्रमाणित  होता है कि वंशीधर जी जनमानस की चेतना और मर्म व्यथा के क्रांतदृष्टा राष्ट्रीय कवि हैं|इसी क्रम में जब देश का विभाजन होने की नौबत आयी तब भी शुक्ल जी ने कविता लिखी-‘बनाओ मियाँ! न पाकिस्तान/देश हो जाएगा वीरान|’ नेहरू और रफ़ी अहमद किदवई को भी शुक्ल जी कवितायें बहुत पसंद थी| उन्ही दिनों लिखा गया उनका चरखा गीत भी बहुत प्रचलित हुआ था-
‘मोरे चरखे का न टूटे तार ,चरखवा चालू रहै |
दुलहा बनिके गांधी जी चलिबे दुलहिन बनी सरकार
चरखवा चालू रहै |’
सन 1925 में शुक्ल जी ने ‘विचित्र सती’ शीर्षक कविता में दिल्ली के शहीद भाई बालमुकुन्द की पत्नी रामऋषी देवी के बलिदान की काव्यात्मक कथा लिखी है|सन 1912 में चांदनी चौक, दिल्ली में  वायसराय लार्ड होर्डिंग पर हमला हुआ था|उसकी सजा में मोरिस नगर के पास बालमुकुन्द,वसंत कुवर ,अमीरचंद, और अवधबिहारी पकडे गए और इन्हें फांसी दी गयी थी| बाद में रामऋषी  ने पति की याद में आत्मदाह करा लिया था|  इसके अलावा भीखमपुर में जन्मे अमर शहीद राजनारायण को लेकर लिखी गयी उनकी कविता बेहद मार्मिक ही नहीं ऐतिहासिक महत्त्व की भी है|
ग्राम स्वराज और ग्रामीड़ भारत की अर्थव्यवस्था पर सही अर्थों में विचार करने वाला गांधी जी के सामन कोई दूसरा नहीं हुआ| वंशीधर जी इसीलिए उन्हें अपना आदर्श मानते थे| जीवन भर उनके सिद्धांतों पर चलने का कार्य भी उन्होंने किया|गांधी जी के देहांत के बाद पूरे देश में जो एक शोक की लहर व्याप्त हुई उस पीड़ा को स्वर देते हुए वंशीधर जी कहते हैं-
हमरे देसवा की मँझरिया ह्वैगै सूनि,
      अकेले गाँधी बाबा के बिना।
कौनु डाटि के पेट लगावै, कौनु सुनावै बात नई,
कौनु बिपति माँ देय सहारा, कौनु चलावै राह नई,
को झँझा माँ डटै अकेले, बिना सस्त्र संग्राम करै,
को सब संकट बिथा झेलि, दुसमन का कामु तमाम करै।
      सत्य अहिंसा की उजेरिया ह्वैगै सूनि,
      अकेले गाँधी बाबा के बिना।
महात्मा गांधी उस समय के भारत के जनमानस के एक मात्र निर्विवाद सबसे बड़े नेता थे|उस समय के प्राय:सभी कवियों ने किसी न किसी रूप में महात्मा गांधी जी को अपनी कविताई का विषय अवश्य बनाया| इस समय के कविसम्मेलनों में उनकी अनेक रचनायें बहुत प्रसिद्द हुई|उन दिनों कविसम्मेलनों में सूर्यकांत त्रिपाठी निराला,गयाप्रसाद शुक्ल सनेही ,हरिवंश राय बच्चन ,गोपाल सिंह नेपाली ,बेधड़क बनारसी,श्यामनारायण पाण्डेय,जानकीवल्लभ शास्त्री,बलबीर सिंह रंग,शिशुपाल सिंह शिशु,और अनूप शर्माजैसे कवि मंचपर अपनी कविताओं से धूम मचा रहे थे| सन 1938 में उन्होंने  कुछ समय केलिए पन्त जी के कहने पर आकाशवाणी में नौकरी की लेकिन अग्रेजियत के वातारवण में मन न लगा और खिलाफत आन्दोलन के चलते वह नौकरी भी छोड़ दी|
अपने समय के साथ चलते हुए वंशीधर शुक्ल जी ने महात्मा गांधी के आन्दोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया । किसानी ही उनकी आजीविका का मुख्य साधन था|देश को  स्वतंत्रता मिलने के बाद वे   उत्तर प्रदेश  के  लखीमपुर खीरी विधान सभा से 1952 से 1962 तक विधायक भी रहे। अपने परिवार को सुविधा संपन्न करना तो बहुत दूर ,विधायक  रहने के बावजूद अपने जीते जी अपना पक्का घर भी न बनवा सके|उनकी चेतना में व्यक्तिगत सुविधा जैसा विचार ही न था | जीवन बिल्कुल खुली किताब जैसा था|लेकिन लगातार किसानों की उपेक्षा और कांगेस में दलीय विचलन के कारण उन्होंने राजनीति में आगे सक्रिय रहने का विचार त्याग दिया,लेकिन उनका लेखन चलता रहा| वो समझ चुके थे कि ये वो कांगेस नहीं है,जो साम्राज्यवादी ताकतों से लड़ने के लिए संगठित हुई थी स्वतंत्रता के बाद जिसे महात्मा गांधी भंग करने की बात कर रहे थे | शुक्ल जी गांधीवादी नेता सामाजिक कार्यकर्ता और कवि के रूप में स्वतंत्रता आन्दोलन से ही विख्यात हो चुके थे|जब वे अपने समाज की दयनीय दशा देखकर आक्रोश से भर जाते हैं तभी लिखते हैं-
ईंट किसानन के हाड़न की/लगा खून का गारा
पाथर अस जियरा किसान का /चमक आंख का तारा
लगी देस भगतन की चरबी/चिकनाई जुलमन की
घंटा ठनकइ  अन्यायिन का/कथा होय पापन की |
जहां बसै ऊ जम का भैया/खाय खून की रोटी
हुवै बनी बूचड़खाना असि यह राजा की कोठी|
तात्पर्य यह कि सामंतो और राजाओं की कोठियों की दीवारों में किसानों हड्डियां ईटों की तरह उनके खून के गारे से चिपकायी गयी हैं|उनमें जड़े  पत्थर वास्तव में किसानो का दिल है| उनकी चमक वास्तव में किसानों की आँखों की चमक है| सामंतों ने किसानों और मजदूरों को धोखा देकर उन्हें हसीन सपने दिखाने का ही काम सदियों से किया है| उन्हें ये राजाओं और सामंतों की कोठियां वास्तव में बूचड़खाने जैसी दिखाई देती हैं|शुक्ल जी के सामने देखते ही देखते नेता सामंतों से मिलकर किसानों और गरीब जनता को लूटने का काम करने लगे तब ऐसी दशा में उनका कांग्रेस से विमुख होजाना स्वाभाविक ही था| सन 1961  में उन्होंने नेहरू को चेतावनी देते हुए कविता लिखी थी जो इस प्रकार है-
ओ शासक नेहरू! सावधान/पलटो नौकरशाही विधान
अन्यथा पलट देगा तुमको/मजदूर वीर योद्धा किसान |
शुक्ल जी की रचनावली बहुत बाद में डॉ.श्यामसुंदर मिश्र मधुप जी के कुशल संपादन में और उनके सुपुत्र सत्यधर शुक्ल के सहयोग से वर्ष 2003 में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ द्वारा प्रकाशित हुई| सत्यधर जी यशस्वी पिता की लीक को आगे बढाते हुए अवधी और हिन्दी  में लगातार लिख रहे हैं|वंशीधर जी का देहांत वर्ष 1980 में हो चुका था|हालाकिं उनके जीवन काल में ही लखनऊ सहित अनेक विश्वविद्यालयों में उनकी कवितायेँ पाठ्यक्रम में शामिल की जा चुकी थीं| तथापि यह कहा जा सकता है कि वंशीधर जी को लेकर जिस प्रकार से हिन्दी और अवधी वालों को काम करना चाहिए था वह नहीं हो सका|अवध के किसानों की बेहतरी की चिंता न तो अवध के सामाजिक कार्यकर्ताओं में दिखाई देती है न अवध के हिन्दी के साहित्यकारों में|यही कारण है की आज भी जब हम जनकवि वंशीधर जी की कविताओं को पढ़ते हैं तो आज भी वे उतने ही प्रासंगिक जान पड़ते हैं|उनका रचना संसार वर्ष 1925 से लेकर 1980 तक फैला हुआ है| किसान की जिन्दगी कैसे बीतती है एक अंश देखिये-
बड़े सबेरे ते हरु नाधई ,जोतइ ,बवइ ,मयावइ
फिरि खारा,खुरपा हंसिया लै चारा घासइ जावइ
दुपहरिया मा चारि पनेथी ,बड़की लोटिया पानी
कबऊ चबेना ,मट्ठा ,सरबत ,अइसइ गइ जिंदगानी |
शुक्ल जी हमारे समय के बड़े किसानवादी और ग्राम्य स्वराज की चेतना वाले जनकवि हैं| किसान चेतना को मार्मिकता से व्याख्यायित करने वाली उनकी प्रमुख कवितायें-किसान बंदना,खेतिहर,किसान की अर्जी,गाँव की दुनिया,ग्रामीण मजदूर, किसान की दुनिया,चौमासा,हुवां कस कस होई निरबाह ,लूक,राजा की कोठी,राम मडैया ,अछूत की होरी,चरवाहा,हरवाहा,बेगारि,भुखमरी,कचेहरी,अम्मा रोटी,धन्य गाय के पूत,पंछिन की आह,बिरवन की बतकही,बनिजरवा,बहिया,कन्या की इच्छा,पाथर बरखा,जंगल की दुनिया,मीलन की दुनिया आदि हैं | ये  अनेक सामाजिक सरोकारों वाली कवितायें उनके किसान मजदूरों के पक्ष में सदैव खड़े रहने की गवाही देती हैं|उनकी कविताओं में एक तो राष्ट्रवादी चेतना है और दूसरा स्वर गरीब किसान मजदूर की विवशता से जुडी जनचेतना है | किसानों मजदूरों के जीवन को व्याख्यायित करने वाली कवितायें कवि के समय को और उसके समाज समझने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं| ग्राम्य प्रकृति के अनमोल चित्र तो स्वाभाविक रूप से शुक्ल जी की कविताई का अलंकार हैं ही शुक्ल जी का जीवंत मनोरम प्रभातचित्रण देखिये-
सविता उवै जोंधैया अथवइ चलइ मंद पुरवइया
कोइली कों कों कुतवा पों पों चों चों करइ चिरइया
बर्ध दुवौ पागुर मा लागे गाय पल्हानि हुंकारइ
टटिया फारे बछरा झांकइ रहि रहि मूडु निकारइ
टेंटे पर लरिका का दाबे मेहरी द्वार बहारइ
बड़का लरिका गेंदु  बनाये सूखे ब्याल उछारइ|   
 पारिवारिक समस्याओं और अभावों के चलते यद्यपि शुक्ल जी की पारंपरिक शिक्षा आठवीं तक ही हो सकी लेकिन स्वाध्याय से उन्होंने हिन्दी,संस्कृत,उर्दू अंगरेजी आदि भाषाए सीखीं थी|ख़ास बात यह कि उनकी शिक्षा जीवन और किसानी की बारीकियों को समझने में संपन्न हुई| उन्होंने किसानों की दुनिया और उनके समाज को जानने समझने में ही अपना सारा जीवन समर्पित कर दिया| दूसरी ओर उन्होंने जीवन और प्रकृति के व्यवहार को जानने और परखने में भी कोई कसर नहीं छोडी| अपने समाज को पढ़ने लिखने और सभ्य बनाने की प्रेरणा वे लगातार अपनी कारयित्री और भावयित्री क्षमता से देते रहे|मंहगाई पर लिखी उनकी कविता का अंश देखिये-
हमका चूसि रही मंहगाई।
रुपया रोजु मजूरी पाई, प्रानी पाँच जियाई,
पाँच सेर का खरचु ठौर पर, सेर भरे माँ खाई।
सरकारी कंट्रोलित गल्ला हम ना ढूँढे पाई,
छा दुपहरी खराबु करी तब कहूँ किलो भर पाई।
हमका चूसि रही मंहगाई। 
सरकारी कंट्रोल से मिलने वाले अनाज से गरीब मजदूर और कम जोत वाले किसान का आज भी  पेट नहीं भरता|सत्तर के दशक में जब एक रुपया रोज की मजदूरी मिलती थी तब भी ऐसी ही दशा थी सरकारी खाद्यान्न वितरण नीतियों की आलोचना करते हुए शुक्ल जी बताते हैं कि सरकारी गल्ला कैसे गायब हो जाता है|गरीब को छ सात दिन लाइन लगाने के बाद भी पूरा अनाज नहीं मिला पाता|
गाँव में दलितों के जीवन में आज भी बहुत परिवर्तन नहीं हुआ है|पराधीन भारत में यह दशा और भी हृदयविदारक थी|अछूत समझे जाने वाले हमारे समाज के निम्न जातियों वाले मनुष्यों के साथ पशुओं से भी बदतर व्यवहार हमारे ही सवर्ण मानसिकता वाले आस पड़ोस के लोग कर रहे थे| ऐसी घृणा की मानसिकता का  चित्र शुक्ल जी ‘अछूत  की होली’ शीर्षक कविता में अभावग्रस्त दलित मन की व्यथा के साथ  रेखांकित करते है-
हमैं यह होरिउ झुरसावइ।
खेत बनिज ना गोरू गैया ना घर दूध न पूत।
मड़ई परी गाँव के बाहर, सब जन कहैं अछूत॥
द्वार कोई झँकइउ ना आवइ।
   शुक्ल जी किसान जीवन जीने के कारण किसानो के पक्षकार के रूप में अपनी स्वाभाविक भूमिका निभाते हुए आगे बढ़ाते हैं|यह साफ़ करते हुए चलते हैं कि किसान की रोटी छीनकर खाने वाले हजारों ठग हैं|निम्न कविता में देखिये-
यक किसान की रोटी,जेहिमाँ परिगइ तुक्का बोटी
भैया!लागे हैं हजारउँ ठगहार।
हँइ सामराज्य स्वान से देखउ बैठे घींच दबाये हइँ
पूँजीवाद बिलार पेट पर पंजा खूब जमाये हइँ।
गीध बने हइँ दुकन्दार सब डार ते घात लगाये हइँ
मारि झपट्टा मुफतखोर सब चौगिरदा घतियाये हइँ।
तात्पर्य यह कि कठिन परिश्रम से कमाई गयी किसान की एक रोटी पर भी साम्राज्यवादी कुत्ते गरदन झुकाकर नजर गडाए बैठे हैं|,पूंजीवादी बिल्लियाँ,गीध जैसे दुकानदार और मुफतखोर सब घात लगाए बैठे हैं|आज देश की स्वतंत्रता के सात दशकों के बाद भी हमारे समाज में किसानों की दशा लगभग उनके समय जैसी ही है, कुछ तकनीकी औजारों और वैज्ञानिक विकास की किंचित प्रगति के अतिरिक्त कोई ख़ास परिवर्तन किसान की दुनिया में नहीं हुआ है|वह आज भी भूखा है,कर्जदार है और आत्महत्या के लिए विवश है|शहरीकरण तो उलटे सीधे ढंग से बढ़ा है किन्तु गाँवों का सर्वनाश हुआ है| सत्तर के दशक में लिखी अपनी कविता के माध्यम से शुक्ल जी पूछते है-
रोय रहे सब भारतवासी,हाय देसा का को विश्वासी
कृषक श्रमिक विद्यार्थी तड़पें बढ़ी लूट अफसर ऐयासी
नौकरसाही का थनु पकरे लटकि रही सरकार  
देस का को है जिम्मेदार |
चौराहे पर ठाढ किसनऊ ताकै चारिव वार||
 नौकरशाहों की नीतियों के समक्ष बौना महसूस करती हमारी सरकारें आज तक किसानों के साथ न्याय नहीं कर सकी हैं|कृषियोग्य भूमि का दुरुपयोग लगातार कस्बों और शहरों के निकट की जमीनों पर किया गया और लगातार जारी है|किसान को कभी अपनी उपज का वाजिब मूल्य सरकारों ने नहीं दिया| बैंकों के अलावा महाजनों के चंगुल में आज भी किसान फंसा हुआ है|आज जिस शहरीकरण की ओर लगातार हमारा समाज बढ़ा है उसके पतित जीवन मूल्यों और रहन सहन की बात शुक्ल जी ने वर्ष 1935 में लिखी ‘हुवां कस कस होई निरबाह ’शीर्षक कविता में बखूबी की है|कविता का अंतिम अंश देखिये-
जहां की दुनियइ छायाबाद,भेखु भाखा बखरी ब्यउहारु
पेट मा कपट बात मा दगा जीभ मा झूंठ ओठ मा प्यारु |
आँखि मा नसा चित्त मा छोभु ,देह मा रोग रूपु सुकुमार
दउसु भरी काटइ सबके प्याट ,यहै बइपारु लच्छ ब्यभिचार|
जहां पर कहइ  चोर का साह/ हुवां कस कस  होई निरबाह |
कहने को बहुत कुछ कहा जा सकता है,परन्तु अब तक कुछ चंद हिन्दी के लोगों ने ही उनकी रचनाशीलता को रेखांकित भी किया है|सबसे पहले मेरे गुरुवर प्रो.हरिकृष्ण अवस्थी जी ने लखनऊ विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में उनकी कविताओं को पाठ्य विषय के रूप में वर्षं 1977 में सम्मिलित किया |इस प्रकार बाद में अनेक विश्वविद्यालयों में उनकी कविताएँ पढाई जाने लगीं| लेकिन उनकी रचनाशीलता पर समग्र कार्य वर्ष2003 में डॉ.श्यामसुंदर मिश्र मधुप जी के संपादन में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान से प्रकाशित उनकी रचनावली के रूप में आया|इस सबके बावजूद विडम्बना देखिये की अवध से इतर प्रदेशों के रचनाकारों और हिन्दी के विद्वानों ने ऐसे महत्वपूर्ण कवि को लेकर कोई पाठचर्या की व्यवस्था नहीं बनाई| उन्हें केवल अवधी के रचनाकार के रूप में सीमित कर दिया गया|मधुप जी के शब्दों में वे अवधी रचनाशीलता के सम्राट हैं| आधुनिक अवधी रचनाकारों की त्रयी की बात करें तो उनमे तीन किसानवादी जनकवि मिलते हैं जिनमें सर्वश्री बलभद्रप्रसाद दीक्षित पढीस ,वंशीधर शुक्ल,और रमई काका का नाम उल्लेखनीय है|इन तीनों ने महाकाव्य या खंडकाव्य भले ही न लिखा हो किन्तु अवध के ग्राम्य जीवन के मार्मिक प्रसंगों को गहराई से व्याख्यायित किया है|यदि वंशीधर शुक्ल जी की अवधी सेवा की बात की जाए तो शुक्ल जी ने पढीस जी या रमई काका की अपेक्षा बहुत अधिक कार्य किया है| ये सब  अपने समाज के जनकवि हैं| शुक्ल जी अपने समाज के नेता भी बने और जब कांगेरस से निराश हुए तो राजनीति से संन्यास ले लिया|वंशीधर जी का स्वर अपनी कौम और सामाजिक दुनिया के लिए एकदम साफ़ है|वे निराला की तरह अकुतोभय रचनाकार हैं|