रविवार, 5 अगस्त 2012


अवधी उपन्यास की नई रोसनी- चंदावती


- रवीन्द्र कात्यायन

प.शिवराममिश्र शि.सा.सम्मान-2012 के अवसर पर चन्दावती का लोकार्पण बाएँ से श्रीमती भारती मिश्र,सम्मानित साहित्यकार डाँ उमाशंकर शितिकंठ,विभांशु दिव्याल,शिवमूर्ति. और भारतेन्दु मिश्र


चन्दावती पर बोलते हुए वरिष्ठ कथाकार-शिवमूर्ति जी
हिंदी साहित्य के विस्तार के साथ-साथ हिंदी की उपभाषाओं में भी आज नई-नई विधाओं में रचनाकर्म हो रहा है। अवधी, भोजपुरी, ब्रज, मैथिली आदि में लिखे हुए साहित्य की परंपरा बहुत पहले से है। लेकिन आज जिस तरह की रचनाएँ इन उपभाषाओं में लिखी जा रही हैं, उस तरह की पहले नहीं लिखी गईं। इसका नया उदाहरण है अवधी में लिखे जाने वाले उपन्यासों की परंपरा। अवधी में नए उपन्यासों की रचना अवधी में एक नया प्रस्थान बिंदु है। भारतेन्दु मिश्र के दो अवधी उपन्यासों– नई रोसनी और चंदावती के द्वारा अवधी में उपन्यास लेखन का नया दौर शुरू हुआ है। जिसके लिए डॉ. विद्याबिन्दु सिंह ने लिखा है- भाई भारतेन्दु मिश्र कै ई अवधी उपन्यास एक बड़े अभाव कै पूर्ति करै वाला है। वै ई उपन्यास लिखि कै एक लीक बनाइन हैं जौने से अवधी म लिखै वाले अवधीभासी प्रेरणा पाय सकथिन।  (भूमिका, चंदावती)


भारतेन्दु मिश्र का नया उपन्यास चंदावती समकालीन भारतीय ग्राम का यथार्थ रूप प्रस्तुत करता है। यह उनके पहले उपन्यास नई रोसनी का विस्तार ही है जिसमें एक नई कथा और नए वातावरण द्वारा आज के भारत का गाँव पुनः जीवंत हो जाता है। इस गाँव में सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक रूप में जो हो रहा है, उसका यथार्थ चित्रण चंदावती का प्रमुख उद्देश्य है जो पाठकों को तो आकर्षित करता ही है, इसके साथ उनके मन में कई प्रकार के असहज करने वाले प्रश्न भी खड़े करता है। लोक में रची-बसी संस्कृति का सूक्ष्म और मनोहारी वर्णन भी कथाकार की सफलता है। आज के बदलते गाँव की तस्वीर चंदावती उपन्यास में इस तरह प्रस्तुत की गई है कि वो हमारे सामने एक स्वप्न भी निर्मित करता है। स्वप्न परिवर्तन का, स्वप्न एक नई व्यवस्था का, स्वप्न जाति-व्यवस्था के प्राचीन भँवर में फंसे समाज को उससे मुक्त करने का और सबसे ज़रूरी स्वप्न स्त्री की मुक्ति का- वह भी ग्रामीण स्त्री की मुक्ति का। ग्रामीण-स्त्री, जो शायद कुलीन स्त्री-विमर्श के केन्द्र में नहीं है। बहरहाल...
चंदावती की कथा है एक बाल-विधवा लड़की चंदावती और गाँव के सभ्य, कुलीन और विधुर ब्राह्मण हनुमान शुक्ल की प्रेम कथा की, जिसकी परिणति विवाह में होती है। विवाह भी नए प्रकार का। ग्रामीण व्यवस्था में आज से तीस साल पहले इस तरह का विवाह एक क्रांतिकारी कदम था। गाँव के बाहर कुछ लोग नरसिंह भगवान के चबूतरा के सामने जाते हैं और सरपंच के सामने पंचायत होती है। फिर वहीं हनुमान शुक्ल और चंदावती तेलिन का विवाह होता है। न सिर्फ़ जाति के बंधन टूटने के स्तर पर बल्कि स्त्री और पुरुष की सोच में परिवर्तन के स्तर पर भी यह विवाह अनोखा था। यही नहीं समाज को जब पता चलता है, तो भी दोनों को कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। हाँ हनुमान के छोटे भाई छोटकऊ से उनका अलगाव घर में पहले ही हो चुका था, खेती को छोड़कर। और यह खेती ही चंदावती की हत्या और दौलतपुर गाँव में स्त्री जागरण का कारण बनती है।



हाशिए का विमर्श अवधी में इस तरह शायद पहली बार दिखाई दिया है। लोक गीतों और लोक संस्कृति में तो बहुत से चित्रण हुए हैं लेकिन आज के ज़माने का यह चित्रण अवधी में बिलकुल नया है। स्त्री कमज़ोर तो है लेकिन उसके साथ कदम से कदम मिलाकर चलने वाली गाँव की अन्य महिलाएँ भी खड़ी हो जाती हैं। उसे जब उसका देवर और भतीजा उसके पति हनुमान शुक्ल की मृत्यु के बाद घर से बाहर निकाल देते हैं तो वो रोती नहीं बल्कि अपने घर के बाहर अनशन पर बैठ जाती है। यह है आज की स्त्री की जागृति- अपने अधिकारों के लिए। चंदावती शुरू से ही ऐसी ही निडर रही है। जब उसके सामने हनुमान शुक्ल विवाह का प्रस्ताव भेजते हैं तो वो उन्हें अपने घर बुलाती है और उनसे पूछती है कि तुम्हारे घर में हमारी स्थिति क्या होगी? पत्नी की या रखैल की? हमारे बच्चों को ज़मीन ज़ायदाद में हिस्सा मिलेगा या नहीं? आदि-आदि प्रश्न। कहना न होगा कि इस तरह का साहस हमारे समाज की लड़कियों में आज भी नहीं मिलता है। यदि हमारी लड़कियाँ चंदावती की तरह साहस और विवेक से काम लें तो न सिर्फ़ उनके प्रति अपराध कम होंगे बल्कि उनके ख़िलाफ़ होने वाले अत्याचारों को भी विराम लगेगा।        



पुरुष व्यवस्था के षड़यंत्र इतने ख़तरनाक हैं कि ऐसी साहसी चंदावती भी पुरुष द्वारा छली गई। हनुमान शुक्ल ने उसे विवाह से पहले नहीं बताया कि वो पहलवानी करते हुए चोट लगने से नामर्द हो चुके हैं। जब उसे पता चलता है तो बहुत नाराज़ होती है लेकिन क्या कर सकती थी। जितनी कोशिश कर सकती थी, उसने की लेकिन कोई संतान न हुई। और तीस साल के लंबे वैवाहिक जीवन के बाद हनुमान की मृत्यु ने उसे नए भँवरजाल में फंसा दिया। तेरहीं की रात को ही उसके देवर ने उसे घर से बाहर निकल जाने को कहा और सुबह होते ही उसे बाँह पकड़कर घर से निकाल दिया कि अब तुम्हारा यहाँ कोई काम नहीं। चंदावती सोच रही है- सीता होय चहै मीरा यहि दुनिया मा हर औरत का परिच्छा देक परति है। जीका मंसवा न होय, तीकी कवनिउ इज्जति नहीं। औरत तौ अदमी कि छाँह मानी जाति है, आदमी ख़तम तौ औरत जीते जिउ आपुइ खतम हुइ जाति है। बेवा कि जिन्दगी मुजरिम कि जिन्दगी तना कटति है। द्याखौ अब हमरी किस्मति मा का लिखा है। (पृ. 20)



इस षड़यंत्र में गाँव का प्रधान ठाकुर रामफल भी शामिल है, जिसने उन दोनों की शादी कराई थी। चंदावती को उस दिन की याद आ गई जब कूटी पर पंद्रह बीस लोगों की पंचायत लग गई थी- फेरे लेने से पहले। अधिकतर लोगों का विरोध ही था। सबसे अधिक हनुमान के छोटे भाई छोटकऊ का। लेकिन जायदाद के बँटवारे को रोकने के लिए वो मान गया। फिर धर्म के ठेकेदार पंडितजी दक्षिणा बढ़ाकर मंत्र पढ़ने के लिए तैयार हो गए। प्रधान रामफल हनुमान से बहुत से काम निकालता था सो उसने उनके हिसाब से ही सबको तैयार करवा दिया। पंडित ने कहा- तुम सब जनै तैयार हौ तौ बिधि-बिधान हम करवाय द्याबै। हमका तौ मंतर पढ़ैक है, संखु बजावैक है, अपनि दच्छिना लेक है। यू बिहाव नई तना का है। यहिमा दच्छिना सवाई हुइ जाई जजमान। बिहाव होई तो चंदावती तेलिन ते सुकुलाइन हुइ जाई। काहे ते जाति तो मर्द कि होति है। भगवान किसन कि तौ साठि हजार रानी रहै, सबकी अलग-अलग जाति रहै। सबका वहै सनमान रहै। परधान दादा जाति तो करमन ते बनति है, बेदन मा यहै सबु लिखा है। (पृ. 36) और इसी दिन को याद करके चंदावती सोच रही है- क़ि औरत कि जिन्दगी वहिके मर्द के बिना साँचौ माटी है- मर्द चहै सार नपुंसक होय, चहै कुकरमी होय लेकिन होय जरूर। (पृ. 46)



लेकिन चंदावती हार नहीं मानती है और गाँव की ही अन्य विधवा कुंता फूफू के साथ वहीं धरने पर बैठ जाती है। उन दोनों का साथ देने को गाँव की अन्य स्त्रियाँ भी शामिल हो जाती हैं। चंदावती के भाई संकर की बेटियाँ मीरा, मीना और ममता भी इस जंग में शामिल हो जाती हैं। चंदावती स्त्रियों के इस गुट को देवी दल का नाम देती है। वे सब वहीं पर देवी गीत, भजन गाती हैं और बीच-बीच में नारा लगाती हैं- सिव परसाद होश में आओ, चंदावती से ना टकराओ। यह जागरण ग्रामीण-स्त्री का नया जागरण है जो उसे इक्कीसवीं सदी की नारी बनाता है। देवी दल की स्थापना भी चंदावती का सपना है क्योंकि स्त्रियों की एकता ही उन्हें मर्द के अत्याचारों से मुक्त करवा सकती है। उसके लिए दुनिया भर की स्त्रियाँ देवी हैं जिन्हें जागृत करने की आवश्यकता है। वह अपने भाई संकर से कहती है- दुनिया भरेकि मेहेरुआ हमरे लेखे देबी आँय। वुइ जिन्दगी भरि अदमिन क कुछ न कुछ दीनै करती हैं, जेतना अदमी उनका देति है वहिके बदले वुइ हजारन गुना लउटाय देती हैं। वुइ अदमी क पैदा करै वाली हैं। अदमी हरामजादा वहेक बेज्जत करति है, वहेक नंगा कीन चहति है- वहे महतारी बिटिया के नाम ते याक दुसरे क गरियावति है। अब जमाना बदलि गवा है अब हमरे देस कि रास्ट्रपति प्रतिभा देबी सिंह हैं।” (पृ. 73)   
चंदावती के विरोध में गाँव का मुखिया, सारा सवर्ण समाज, उसका देवर और उसका परिवार, पुलिस व्यवस्था सब शामिल हो जाते हैं लेकिन अपनी बुद्धि और साहस के चलते चंदावती हार नहीं मानती। उसका मानना है कि दुनिया की हर स्त्री की एक ही जाति है- स्त्री जाति जिसके पास छिपाने को कुछ भी नहीं है। सभी एक तरह की दुख-तकलीफ़ सहती हैं, सभी एक तरह अपना घर-परिवार छोड़कर दूसरे के घर में अपनी जगह बनाती है और सब एक तरह से ही बाल-बच्चा पैदा करती हैं, और सब एक तरह ही पति की लातें खाती हैं। इसलिए वह अपने गाँव की स्त्रियों को एक जगह इकट्ठा करती है और उन्हें जागृत करती है। वह उन्हें जगाने के लिए एक गीत बनाती है जो देवी दल का स्वर बन जाता है-
गुइयाँ मोरी डटिकै रहौ
गुइयाँ मोरी बचिकै रहौ दर्द अपन आपस मा खुलि कै कहौ।  (पृ. 101)  



लेकिन चंदावती और कुंता दोनों का साहस भी उन दोनों की हत्या को रोक नहीं पाता है। उन्हें नहीं पता था कि उनका सामना पेशेवर हत्यारों से है जो किसी भी तरह से उन्हें छोड़ने वाले नहीं। धन-संपत्ति, जायदाद आदि के लिए तो लोग कुछ भी कर सकते हैं। ऐसे में छोटकऊ और सिवपरसाद अपने घर की स्त्री चंदावती के साहस से बौखलाकर उसके ऊपर हमले पर हमले करते हैं और अंत में कुंता फूफू के साथ उसकी हत्या तक करवा देते हैं। लेकिन जो काम चंदावती जीते-जी नहीं कर सकी, वो उसकी हत्या ने कर दिया। चंदावती के हत्यारे न सिर्फ़ पकड़े गए, बल्कि उसके हक की संपत्ति पर देवी दल, स्कूल और स्त्रियों के स्वरोज़गार केन्द्र की स्थापना भी हुई।



चंदावती उपन्यास को न सिर्फ़ ग्रामीण-स्त्री विमर्श के लिए याद किया जाएगा वरन् अपनी सांस्कृतिक विविधता के वर्णन के लिए भी भुलाया नहीं जा सकता। इसमें अवध के गाँवों की संस्कृति जीवंत रूप से अभिव्यक्त हुई है। विवाह में होने वाले नकटौरा का वर्णन बड़ा ही अद्भुत बन पड़ा है। लोकाचार भी इसमें आज की स्थिति के अनुसार दिखाई देते हैं। आज के गाँवों में राजनीति किस तरह अपना दखल देने लगी है, इसमें पता चलता है। छोटे से काम के लिए मंत्री निरहू परसाद की सिफ़ारिश लगवाना किस तरह घातक हो सकता है, चंदावती उपन्यास में पढ़ा जा सकता है। पुलिस, पत्रकार, मंत्री और प्रधान मिलकर किस तरह एक नई व्यवस्था का निर्माण कर रहे हैं- इस कृति में बड़ी सच्चाई से प्रदर्शित होता है। सबसे बड़ी बात यह कि इक्कीसवीं सदी में भारत में जाति व्यवस्था के प्रश्न अभी भी वैसी ही जड़ें जमाए हुए हैं, जो आज़ादी से पहले थे। भले ही चंदावती ने अंतरजातीय विवाह किया था, वो भी तीस साल पहले लेकिन अभी भी जाति के समीकरण अपनी पूरी शक्ति के साथ ज़िंदा हैं। ऐसा नहीं होता तो पत्रकार रुपए लेकर प्रधान ठाकुर रामफल का नाम रिपोर्ट से निकाल न देता। रामफल पत्रकार से कहता है कि- तुमरी बनायी खबरि क्यार माने होति है। सिवपरसाद, बिनोद औ छोटकौनू का कसिकै लपेटि देव। सब सार चूतिया बाँभन आँय। अपनी बिरादरी क्यार- माने हमार ध्यान राखेव।” (पृ. 122) । इस पर पत्रकार कहता है- “दादा तुम तो मजबूर कै दीन्हेव।” (वही) इससे पता चलता है कि जाति का दबाव अभी भी समाज में बहुत अधिक है जिसका अच्छा-बुरा प्रभाव समाज पर हमेशा पड़ता है।     
एक और आकर्षण है इस उपन्यास का कि यह बेहद पठनीय है और पूर्वदीप्त शैली का उपयोग करता है। चंदावती को बार-बार याद आता है कि किस तरह उनका विवाह हुआ था हनुमान शुक्ल के साथ। उपन्यास वर्तमान और अतीत के बीच कथा को इस तरह सुनाता है जैसे किस्सा सुना रहा हो। और इस किस्सागोई में वर्तमान और अतीत के सभी नाते-रिश्ते, संबंध उघड़ते चले जाते हैं। हर बात कहने के लिए कथाकार के पास कोई न कोई नया पात्र है जो अपनी स्टाइल में उस बात को बताता है। लेकिन इस वर्तमान और अतीत की लुका-छिपी के बीच कथारस में कोई बाधा नहीं आती है। कहीं-कहीं चंदावती का स्वप्न प्रवाह भी है, जब वो अपने अतीत की गहराइयों में खो जाती है। गाँव में स्त्रियों को जागृत करने के लिए लोक गीतों का सहारा लिया गया है। इतना ही नहीं, ग्रामीण संस्कृति में रची बसी गालियों का प्रयोग भी इसकी भाषा को और अधिक आकर्षक और प्रामाणिक बना देता है। छुतेहर, भतारकाटी, दहिजार आदि गालियाँ अश्लील नहीं लगती बल्कि लोक भाषा को जीवंत बना देती हैं।
ये उपन्यास स्त्री की कहानी तो है ही, पुरुष-सत्ता के षड़यंत्रों को समझने का एक सार्थक औजार भी है। गाँव में पुरुष-सत्ता को चुनौती देने का काम किसी स्त्री ने शायद ही किया हो। चंदावती गांव की पुरुषवादी व्यवस्था में अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराती है और उसमें सार्थक परिवर्तन भी लाती है, भले ही उसे अपनी कुरबानी देनी पड़ती है- यह इस कृति की सबसे बड़ी विशेषता है। इसका गद्य इसकी ऊर्जा है जो कहीं भी बाधित नहीं होता और बिना रुके पढ़ा जाता है। नई रोसनी और चंदावती के बाद भारतेन्दु से अवधी उपन्यास परंपरा को और भी आगे बढ़ाने की उम्मीद है। हिंदी कहानी के शीर्ष हस्ताक्षर शिवमूर्ति का कहना है- यदि चन्दावती हिन्दी या किसी अन्य भाषा मे लिखी जाती तो बेस्टसेलर बुक होती।  
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संपर्कः अध्यक्ष, हिंदी विभाग एवं संयोजक पत्रकारिता एवं जनसंचार, मणिबेन नानावटी महिला महाविद्यालय, विले पार्ले (प), मुंबई-400056. मोबाइलः 09324389238. ईमेल: katyayans@gmail.com   

समीक्षा २.
(विनोद कुमार-महमूदाबाद )






समीक्षा 3(डा.गुणशेखर ,सूरत )



मंगलवार, 1 मई 2012

याक पुरानि मुलाकात


किसान कवि:आचार्य चतुर्भुज शर्मा



 चतुर्भुज शर्मा

 

(रामपुर मथुरा -सीतापुर के याक कवि सम्मेलन मा कविता पाठ करति भये किसान कवि चतुर्भुज शर्मा)
(1910-1998)

भारतीय श्रम संस्कृति की विवेचना करें तो मिलेगा कि हमारे यहाँ जुलाहे ,बढई,नर्तकियाँ और किसान भी कविता करते रहे हैं।
काव्यं करोमि नहि चारुतरं करोमि
यत्नात्करोमि यदि चारुतरं करोमि।
हे साहसांकमौलिमणिमण्डितपादपीठ
कवयामि वयामि यामि च।
यह एक जुलाहे की कविता है जिसे सुनकर राजा भोज ने अपने समय में उसे कविताई का समुचित पुरस्कार देकर विदा किया था। आचार्य चतुर्भुज शर्मा ऐसे किसान कवि हैं जिन्होने जीवनपर्यंत किसानी की कभी अपनी काविता की एक भी पंक्ति कागज पर नही लिखी। उन्हे सबकुछ कण्ठस्थ था।माने वो तो चलती फिरती किताब थे।जब (कुमुदेश जयंती 16अक्तूबर सन-1985)मैने उनसे बात की तो पाया कि चतुर्भुज शर्मा हिन्दी जगत के एक स्वीकृत ज्ञानस्तम्भ हैं जिनका परिचय गाँव के अपढ से लेकर विश्वविद्यालयो के तमाम शोधछात्रो से भी बराबर बना है। पढीस-वंशीधर शुक्ल-रमई काका की परवर्ती परम्परा में अवधी कवियो मे चतुर्भुज शर्मा का नाम आता है। वे अवधी के विकास हेतु प्रत्नशील थे उनदिनो। नादिरा महाकाव्य,सीताशोधखण्डकाव्य, परशुरामप्रतिज्ञा,ताराबाई, सिंहसियार,ईष्याका फल,तुलसीदास की जीवनी,महात्मागान्धी की जीवनी,हनुमान शतक,कुत्ता भेडहा केरि लडाई आदि अनेक रचनाएँ शर्मा जी कंठाग्र थी। ऐसे किसान कवि चतुर्भुज शर्मा सीतापुर के ग्राम बीहटबीरम के निवासी थे। प्रस्तुत है उससमय हुई बातचीत के प्रमुख अंश-
भा.मि.
आपने नादिरा महाकाव्य की रचना की है तो उसकी प्रेरणा आपको कहाँ से मिली-
शर्मा जी-
नादिरा खडी बोली मे रचा गया प्रबन्ध काव्य है। ये हरगीतिका छन्द में है। जहाँ तक प्रेरणा का प्रश्न है तो मैने  एक दफे सीतापुर पडाव पर नादिरा फिल्म देखी उसमें नादिरा के जीवन के बडे कारुणिक दृश्य थे।मुझपर कुछ ऐसा प्रभाव पडा कि बस इस नायिका को लेकरकुछ लिखने की प्रेरणा जग गयी। उसके बाद कथानक के विस्तार के लिए मै लाहौर गया -वहाँ से कोई 30 किमी.दूर एक मकबरा है जिसमें नादिरा की मजार है।वहाँ जहागीर और नादिरा के तैलचित्र भी मैने देखे वहीं से फारसी भाषा मे नादिरा से सम्बन्धित कुछ साहित्य भी सुलभ हो पाया..तो इस प्रकार मैने नादिरा पर काव्य लिखा।
भा.मि.
आप तो अवधी मे भी बहुत कविताएँ लिख चुके हैं तो क्या अवधी हिन्दी की विभाषा मात्र है या उसका अपना अलग अस्तित्व भी है..?
शर्मा जी-
भैया अवधी बडी सशक्त भाषा है।प्रत्येक अनुभूति का प्रत्येक विधा मा अभिव्यक्त करै मा समर्थ है।गोस्वामी तुलसीदास का साहित्य इस बात का प्रमाण है। आजकल के साहित्यकारो का यथोचित सहयोग अवधी को नही मिल रहा है।कुछ मूर्ख लोग इसे गवाँरो की भाषा मान कर अवधी से परहेज करने लगे हैं परंतु मै तो अपना काव्यगुरु तुलसीदास को ही मानता हूँ।खेद है कि आजकविसम्मेलनी कवि अवधी को केवल हास्य की भाषा बनाने मे जुटे है। जबकि हिन्दी की विभाषाओ मे जितना व्यापक स्थान /क्षेत्र अवधी का है उतना हिन्दी की अन्य किसी विभाषा(बृज,बुन्देली,भोजपुरी,बघेली आदि) का नही है। खेदजनक है कि कुछ स्वार्थी लोगो ने आधुनिक अवधी के प्रतिनिधि कवि वंशीधर शुक्ल को भी एक विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम से निकाल दिया है। यह अवधी के लिए ही नही वरन हिन्दी भाषा के विकास के लिए घातक है।
भा.मि.
अवधी मे काव्य की किन विधाओ का प्रयोग किया जा रहा है.? ..आपकी प्रमुख अवधी कविताए कौन सी हैं ?
शर्मा जी
अवधी मे गीत-गजल-दोहा-सोरठा-कवित्त-और सवैया के अलावा मुक्तछन्द आदि काव्यविधाओ का प्रयोग किया जा रहा है। मैने भी इस दिशा मे कुछ प्रयोग किए हैं। मघई काका की चौपाल,कुत्ता भेडहन केरि लडाई,महात्मागान्धी ,बरखा,किसान कै अरदास,बजरंग बिरुदावली आदि अवधी की रचनाए हैं।
भा.मि.
कुछ नवयुवको के मनोभावो को लेकर लिखा हो तो सुनाएँ-
शर्मा जी
भैया लिखा तो बहुत है चार लाइन सुनौ-
हौ बडे पूत बडे घर के,तुमका का परी हियाँ आफति होई।
रोकौ न राह अबेर भई,ननदी कहूँ ढूढति आवति होई।
जाइ अबै कहिबा घर माँ,तब जानि परी जब साँसति होई।
ऐसे कुचालि न भावैं हमै हटौ दूरि रहौ,कोऊ द्याखति होई।
भा.मि.,
,वाह क्या बात है गाँ की युवती और युवक के मनोभावो का मनोरम चित्र है यह तो दादा।
भा.मि.
शर्मा जी मुक्तछन्द कविता के बारे मे आपकी क्या राय है ?
शर्मा जी -
छन्द या छन्दोबद्ध रचना सुनकर गुनगुनाई जाती है,वह याद हो जाती है।मानस की चौपाइयाँ ,गीता के श्लोक सब प्राचीन साहित्य छन्दोबद्ध है जो आज भी समाज का कण्ठहार है,और युगों तक रहेगा। नई कविता या छन्दमुक्त कविता मेरे समझ से परे है। यदि यही दशा रही तो छात्र कविता की आत्मा से कभी परिचित नही हो पायेंगे। स्वार्थो से प्रेरित साहित्यकारो को क्या कहें..।
 भा.मि.
क्या आज के कविसम्मेलनो मे साहित्यिकता विद्यमान है.?
शर्मा जी-
आजकल कविसम्मेलनो का स्तर बहुत गिर चुका है,इसलिए मै अक्सर कविसम्मेलनो मे नही जाता। अब तो कविसम्मेलन एक व्यवसाय हो गया है। अब जो श्रोताओ को हँसाकर मुग्ध करदे वही सफल कवि है। उन कविताओ मे स्तरीय साहित्य खोजना मूर्खता है।
भा.मि.
आपकी दृष्टि मे कविता के मायने क्या हैं..?
शर्मा जी-
कविता क्या है यह तो समीक्षक ही जानें।मै तो जो स्वांत: सुखाय गुनगुनाता हूँ सुनने वाले उसे कविता मान लेते हैं-
कोरो गवाँर पढो नलिखो,कछु साहित की चतुराई न जानौं।
कूर कुसंग सनी मति है,सतसंगति की गति भाई न जानौं।
काँट करीलन मे उरझो परो,आमन की अमराई न जानौं।
गावत हौं रघुनन्दन के गुन,गूढ बिसय कबिताई न जानौं॥

भा.मि.
वाह वाह शर्मा जी बहुत सुन्दर..। कुछ और सुनाइए,आपने तो अवधी मे बहुत लिखा है। कुछ प्रकृति वर्णन से सुनाइए..
शर्मा जी
सन्ध्या के समय का एक चित्र देखिए-जिसे गोधूलि कहा जाता है -
दिनु भरि दौरा धूपी कै अब रथ ते सुर्ज उतरि आये।
गोरू,हरहा सब जंगल ते अपने घर चरि चरि आये।
बछरन ते गैया हुंकारि मिलीं ,गैया का उमगि पियारु परा।
चरवाह बैठि सँहताय लाग,घसियारन बोझु उतारि धरा।।
...एक और वर्षा सुन्दरी का चित्र देखिए-
बिजुरी चमकि उजेरु दिखावै,मेघ मृदंग बजावै
बैठि ताल पर याकै सुर माँ मेढुका आल्हा गावैं।
धरती फिरते भई सुहागिन पहिरे हरियर सारी
रंग बिरंगी फूल कलिन की गोटा जरी किनाई।
बीर बहूटी बडी दूर ते सेंदुर लइके आयी
नद्दी नाउनि पाँव पखारै,नेगु पाय हरषाई।
भा.मि.
वाह दादा क्या कहने हैं..पूरा रूपक हुइगा..औ नद्दी नाउनि का तो जवाब नही..बहुत सुन्दर..। शर्मा जी कालजयी रचनाकार आप किसे मानते हैं.?
शर्मा जी-
भैया जहाँ तक कालजयी रचनाकार की बात है तो कालजयी वही रचनाकार होता है जिसकी रचना की विषयवस्तु शाश्वत होती है। ऐसी रचनाएँ काल की परिधि को पार कर जाती हैं।कबीर-तुलसी-सूर-बिहारी-निराला-प्रसाद-पढीस-बंशीधर शुक्ल-रमई काका आदि की रचनाएँ शाश्वत हैं।ये अपने समय के कालजयी रचनाकार हैं।
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बुधवार, 7 सितंबर 2011


प्रकाश्य उपन्यास(चन्दावती)

किस्त दो :चन्दावती कि नींद

बहुत थकि गय रहै चन्दावती।खटिया पर पहुडतै खन नीद आय गय-सब पुरानी बातै सनीमा तना यादि आवै लागीं।...तीस साल पहिले ,वहि दिन चन्दावती सकपहिता खातिर बथुई आनय गय रहै। गोहूँ के ख्यातन मा ई साल न मालुम कहाँ ते बथुई फाटि परी रहै। हाल यू कि जो नीके ते निकावा न जाय तौ पूरी गेहूँ कि फसल चौपट हुइ जाय। जाडे के दिन रहैं। उर्द कि फसल बढिया भइ रहै। चन्दावती अपनि लाल चुनरिया ओढे हनुमान दादा के ख्यात मा बथुई बिनती रहैं। हनुमान दादा अपने रहट पर कटहर के बिरवा के तरे हउदिया तीर बइठ रहैं। न चन्दावती उनका देखिस न वुइ चन्दावती का। तब चन्दावती जवान रहैसुन्दरी तो रहबै कीन। वहि दिन चन्दावती बथुई बीनै के साथ-अपनी तरंग मा जोर जोर ते --

नदि नारे न जाओ स्याम पइयाँ परी,

नदि नारे जो जायो तो जइबै कियो

बीच धारै न जाओ स्याम पइयाँ परी।

बीच धारै जो जायो तो जइबे कियो

वुइ पारै न जाव स्याम पइयाँ परी।

वुइ पारै जो जायो तो जइबे कियो

सँग सवतिया न लाओ स्याम पइयाँ परी। -- यहै गाना गउती रहैं। हनुमान दादा तब हट्टे-कट्टे पहलवान रहैं। यहि गाना मा न मालुम कउनि बात रहै कि हनुमान दादा चन्दावती ते अपन जिउ हारिगे। जान पहिचान तो पहिलेहे ते रहै। गाँवन मा सब याक दुसरे के घर परिवार का बिना बताये जानि लेति है। वैसे कैइयो लँउडे वहिके पीछे परे रहै,लेकिन आजु हनुमान दादा वहिकी तरफ बढिगे , राजा सांतनु जइसे मतसगन्धा की खुसबू ते वाहिकी वार खिंचि गये रहैं वही तना वहि बेरिया हनुमान दादा चन्दावती की तरफ खिंचिगे। युहु गाना उनका बहुतै नीक लागति रहै,जब चन्दावती गाना खतम कइ चुकी तब वहिके तीर पहुचि के पूछेनि- को आय रे?

चन्दावती सिटपिटाय गय।..फिरि सँभरि के बोली-पाँय लागी दादा, हम चन्दावती।

हमरे ख्यात मा का कइ रही हौ?

बथुई बीनिति है........

बीनि.... लेव।

बसि बहुति हुइगै सकपहिता भरेक...हुइगै

अरे अउरु बीनि लेव। का तुमका बथुई खातिर मना कइ रहेन है।

बसि बहुति हुइगै

तुम्हारि गउनई बहुतै नीकि है,तुम्हार गाना सुनिकै तो हमार जिउ जुडाय गवा।

चन्दावती सरमाय गयीं,तिनुक नयन चमकाय के कहेनि-

कोऊ ते कहेव ना दादा!

काहे?

तुम तौ सबु जानति हौ,बेवा मेहेरुआ कहूँ गाना गाय सकती हैं।..हम तौ बाल-बिधवा हन। ...का करी भउजी जउनु बतायेनि वहै रीति निभाइति है।

अउरु का बतायेनि रहै भउजी?

सुर्ज बूडै वाले हैं।..अबही रोटी प्वावैक है। हमरे दद्दू का हमरेहे हाथे कि पनेथी नीकि लागति है।..कबहूँ फुरसत म बतइबे....,अच्छा पाँय लागी।


चन्दावती चली गय ,लेकिन राम जानै का भवा वहिका गाना- नदि नारे न जाओ...हनुमान दादा के करेजे मा कहूँ भीतर तके समाय गवा रहै। बडी देर तके वुइ वहै गाना मनहेम बार बार दोहरावति रहे। रेडियो के बडे सौखीन रहै। चहै ख्यात मा जाँय, चहै बाग मा ट्रांजिस्टर अक्सर अपने साथै लइ कै चलैं। आजु चन्दावती क्यार गाना उनका बेसुध कइगा ,रेडियो पर वुइ यहै गाना सैकरन दफा सुनि चुके रहैं तेहूँ चन्दावती के गावै के तरीके मा कुछु अलगै नसा रहै जो जादू करति चला गवा। सोने जस वहिका रंगु ती पर लाल चुनरी ओढिके वा हरे भरे गोंहू के ख्यात मा बइठि बथुई बीनति रहै, मालुम होति रहै मानौ कउनिव सरग कि अपसरा उनके ख्यात मा उतरि आयी है। रामलीला मा वुइ कइयौ दफे वहिका कनिया उठाय चुके रहैं लेकिन आजु अकेले मा कुछ औरुइ जादू हुइगा रहै।

खुबसूरत तो चन्दावती रहबै कीन रंगु रूपु अइस कि बँभनन ठकुरन के घर की सबै बिटिया मेहेरुआ वहिके आगे नौकरानी लागैं,बसि यू समझि लेव कि पूरे दौलतिपुर मा वसि सुन्दरी बिटेवा न रहै तब। अब वहिके घरमा तेलु प्यारै क्यार खानदानी काम सबु खतम हुइगा रहै बिजुली वाला कोल्हू बगल के गाँव सुमेरपुर मा लागि गवा रहै। अब चन्दावती के दद्दू मँजूरी करै लाग रहैं।दुइ

बिगहा खेती मा गुजारा मुस्किल हुइगा रहै। तेहू भइसिया के दूध ते चन्दावती के घरमा खाय पियै की बहुत मुस्किल न रहै।

सुमेरपुर मा चन्दावती बेही गयी रहैं मुला किस्मति क्यार खेलु द्याखौ अबही गउनव न भा रहै कि चन्दावती क्यार मंसवा हैजा-म खतम हुइगा। बडी दौड-भाग कीन्हेनि लखनऊ के मेडिकल कालिज तके लइगे लेकिन वहु बचि न पावा। फिरि ससुरारि वाले कबहूँ चन्दावती क्यार गउना न करायेनि याक दाँय चन्दावती के दद्दू सुमेरपुर जायके बिनती कीन्हेनि तेहूँ कुछु बात न बनी।चन्दावती के ससुर साफ-साफ कहेनि –‘संकर भइया, तुम्हार बहिनिया मनहूस है..बिहाव होतै अपने मंसवा का खायगै,..वहिते अब हमार कउनौ सरबन्ध नही है। हमरे लेखे हमरे लरिकवा के साथ यहौ रिस्ता मरिगवा।


चन्दावती के दद्दू बुढवा के बहुत हाथ पाँय जोरेनि लेकिन वहु टस ते मस न भवा। आखिरकार चन्दावती अपने मइकेहेम रहि गयीं,बाल बिधवा के खातिर अउरु कउनौ सहारा न रहै। गाँव कि बडी बूढी चन्दावती क मनहूस कहै लागी रहैं, लेकिन खुसमिजाज रहै चन्दा। बिधवा जीवन के दुख ते यकदम अंजान ,अबही वहिकी लरिकई वाले सिकडी-गोट्टा-छुपी-छुपउव्वल ख्यालै वाले दिन रहै। अबही जवानी चढि रही रहै । बिहाव तो हुइगा रहै-मुला पति परमेसुर ते संपर्क न हुइ पावा रहै। हियाँ गाँव कि गुँइयन के साथ चन्दा मगन रहै। हुइ सकति है अकेलेम बइठिके रोवति होय,लेकिन गाँवमा कोऊ वहिका रोवति नही देखिसि। संकर अपनी बहिनी का बडे दुलार ते राखति रहैं। संकर कि दुलहिनि चन्दा ते घर के कामकाज करावै लागि रहै। चन्दा दौरि-दौरि सब काम करै लागि रहै। समझदार तौ वा रहबै कीन।

जउनी मेहेरुआ वहिते चिढती रहैं वइ चन्दा क्यार नाव बिगारि दीन्हेनि रहै। कउनौ चंडो कहै,कउनौ रंडो कहै तो कउनिव बुढिया रंडो चंडो नाव धरि दीन्हेसि रहै। दौलतिपुर मा नाव धरै केरि यह पुरानि परंपरा आय। बहरहाल चन्दावती कहै सुनै कि फिकिर न करति रहै, वा खुस रहै।

दुसरे दिन हनुमान दादा संकर का बोलवायेनि। संकर घबराय गे ,काहेते वहु दादा ते एक हजार रुपया कर्जु लीन्हेसि रहै। संकर सकुचाति भये हनुमान दादा तीर पहुँचे।हनुमान दादा अपने चौतरा पर बइठ रहैं।

दादा पाँय लागी।

खुस रहौ।आओ,संकर! आओ।...कहौ का हाल चाल ?

तुमरी किरपा ते सबु ठीक चलि रहा है।

चन्दा के ससुरारि वाले का कहेनि?

बुढवा कहेसि हमरे लरिका के साथै यह रिस्तेदारी खतम हुइगै।

हाँ वहौ ठीक कहति है-जब जवान लरिका मरि गवा तो फिरि बहुरिया का घर मा कइसे राखै, चन्दा क्यार गउना?

गउना कहाँ हुइ पावा रहै दादा।...गउने केरि सब तयारी कइ लीन रहै...कर्जौ हुइगा लेकिन चन्दा केरि किस्मति फूटि गय...का करी दादा।

परेसान न हो संकर! जउनु सबु बिधाता स्वाचति है,तउनु करति है।तुलसी बाबा कहेनि है-होइहै सोइ जो राम रचि राखा..

ठीकै कहति हौ दादा!..लेकिन अब हमरे ऊपर बहुति बडी जिम्मेदारी आय गय है।...अब तुमते का छिपायी दादा,..गाँव के कुछु सोहदे हमरी चन्दा कि ताक झाँक मा रहति हैं।..अब हम का करी,वहिका रूपुइ अइस है कि ..

यह तौ अच्छी बात है...कोई ठीक लरिका होय तौ...चन्दा क्यार दुबारा बिहाव करि देव।

बिहाव करै वाला कउनौ नही है..सब मउज ले वाले है..बेवा ते बिहाव को करी?बडकऊ तेवारी क्यार कमलेस,मिसिरन क्यार बिनोद ई दुनहू चन्दावती के चक्कर मा हैं।

..इनके दुनहू के तौ बिहाव हुइ चुके हैं..दुनहू लरिका मेहेरुआ वाले हैं।

यहै तौ..का बताई?...कुछु समझिम नही आवति..

हमरी मदति कि जरूरति होय तो बतायो..तुम कहौ तो तेवारी औ मिसिर ते बात करी।

नाही दादा!..बात-क बतंगडु बनि जायी। चन्दा कि बदनामिव होई सेंति मेति,......कोई अउरि जतन करैक परी।

या बात तो ठीक कहति हौ,संकर!..न होय तौ कहूँ अउरु दूसर बिहाव कइ देव।

याक दाँय क्यार कर्जु तौ अबहीं निपटि नही पावा है।...फिरि जो हिम्मति करबौ करी तो दूसर लरिका कहाँ धरा है।

कोई ताजुब नही है कि हमरी तना कउनौ बिधुर मिलि जाय।

तुमरी तना कहाँ मिली..?

काहे?

अरे कहाँ तुम बाँभन देउता, कहाँ हम नीच जाति तेली।

बात तो ठीक है लेकिन हमका कउनौ एतराज नही है।.जब हमरे घरमा वुइ बेमार रहै तब मालिस करै तुमरी दुलहिन के साथ चन्दा आवति रहै। हमका वा तबहे ते बडी नीकि लागति है,कबहूँ कोऊ ते कहा नही हम आजु तुमते बताइति है।... फिर रामलीला मा वा सीता बनति रहै औ हम रावन बनिति रहै तब वहिका रूप गुन सब परखे हन।हमका कउनौ एतराज नही है। द्याखौ परेसानी तो हमहुक बहुति होई।.....लेकिन जउनु होई तउनु निपटा जायी।....पहिले तुम चन्दावती क्यार मनु लइ लेव,अपने घर मा राय मिलाय लेव। फिरि दुइ-तीन दिन मा जइस होय हमका चुप्पे बतायो।

तुम्हार जस नीक मनई-बाँभन, हमका दिया लइकै ढूढे न मिली,यू तौ हम गरीब परजा पर बहुत उपकार होई।

साफ बात या है कि तुमरी चन्दावती हमहुक बहुत नीकी लगती हैं...लेकिन अबहीं कोऊ गैर ते यह बात न कीन्हेव।

ठीक है दादा।..पाँय लागी..

खुस रहौ।..चन्दावती कि राय जरूर लइ लीन्हेव-काहे ते हमार उमिर वहिके हिसाब ते तनी जादा है।

ठीक है..संकर मनहिम अपनि खुसी दबाये अपने घर की राह लीन्हेनि। संकर कमीज के खलीता ते बीडी निकारेनि तनिक रुकिकै बीडी सुलगायेनि औ खुसी की तरंग मा फिरि घर की तरफ चलि दीन्हेनि। आजु वहिके पाँव सीधे न परि रहे रहैं।


हनुमान दादा अपनि इच्छा संकर ते कहिकै निस्चिंत हुइगे।दुइ साल पहिले उनकी दुलहिन खतम हुइगै रहै,लेकिन उनके कउनव औलादि न भै रहै। संकर घरै पहुचे।वहिके हाथ पाँव थिर न रहैं।वहु रजाना क्यार हाथ पकरिके भीतर वाली कोठरी मा खैचि लइगा।रजाना चौका लीपति रहै तो वहिके हाथ ग्वाबर मा सने रहैं,पूछेसि-

का भवा?

भीतर चलौ फिरि बताई..

अरे, तनी हाथ तो धो लेई

हाथ बादि-म धोयेव,पहिले चलौ..जरूरी बात करैक है....।

संकर रजाना कइहा भीतर कोठरी मा घसीटि लइगे। रजाना चकाय गय। संकर कहेनि-

हम हनुमान दादा के घर ते आय रहेन है। चन्दा कहाँ है?

का हुइगा...चन्दा का?..वा तौ ख्यात वार गय है।

चन्दा केर भागि जागि गवै..।

पहेली न बुझाओ..

पहेली नाई बुझाइति है..साँचौ...हमरी चन्दा केर भागि जागि गै है।

का बतावति हौ ? हमरी समझि मा नही आवा..

भवा यू कि हनुमान दादा..हमरी चन्दा ते बिहाव करै बदि तयार हैं...

का पगलाय गये हौ ?..यू भला कइसे हुइ सकति है?...कहाँ वुइ भलेमानुस

ऊची जाति के बाँभन?..कहाँ हम..

यहै तौ...हमहू कहेन दादा ते तो वुइ कहेनि ..हम तयार हन,..तुम चन्दा ते

पूछि लेव...।

फिरि?

फिरि का हमतौ कमलेस औ विनोद कि सिकाइति करै गे रहन।...हुआँ तो चन्दा कि समस्या क्यार समाधान मिलिगा।

हनुमान दादा जो चन्दा ते बिहाव कइ ल्याहै तो सब बात बनि जाई।

यहै तौ ...कहाँ राजा भोज कहाँ गंगुवा तेली वाली मसल साँचु साबित हुइ जायी।...अइस हुइ जाय तौ बहुत बडी बात हुइ जायी।..हमारि चन्दा सुकुलाइनि हुइ जायी..।

हमरी चन्दा तना खुबसूरत कउनिव दूसरि बिटिया- बहुरिया गाँव मा नही है।

यहै तौ...अब बताओ का कीन जाय?...दादा कहेनि है कि चन्दा केरि राय जरूर लइ लीन्हेव।

ठीक बात है..बाँभन है तो का भवा.,चन्दा के हिसाब ते बहुत उमिरदार हुइहैं...हम चन्दा ते पूछि ल्याबै।..लेकिन हमरी चन्दा जउनु हम कहबै वहै करिहै।

यू तौ ठीकै कहती हौ लेकिन ..जब हनुमान दादा कहेनि है तौ चन्दा केरि राय लेना जरूरी है।

हमार कुछु खरचा तो न होई ?

यहिमा हमार का खरचा होई?...जउनु कुछु परेसानी औ खरचा होई तउनु हनुमान दादा खुदै निपटिहैं।...हमतौ पहिलेहे-ते उनके कर्जदार हन,वुइ हमरी दसा का जानति है।...

..अरे असल परेसानी तौ बाँभन टोले मा होई?...वह मुसीबति हनुमान दादा खुदै निपटिहैं..वहिमा हम का करिबे...यू जो हुइ जायी तो हमहू हनुमान दादा कि सरहज बनि जइबे..।

हम साला बनि जइबे...सुकुल हनुमान दादा के सार कहे जाब..बँभनन टोले क्यार रिस्तेदार हुइ जइबे।...बाँभन देउता माने जाति हैं।

का साँचौ बाँभन देउता होति हैं?...

पुरनिहा अइस कहति रहैं...

अरे हनुमान दादा जो हमरी चन्दा ते बिहाव कइ ले तो जानौ हमरे लेखे देउतै आँय।

तुम ठीक कहती हौ.. ...जो हमार फायदा करै वहै हमार देउता।

...लेकिन गाँव मा लडाई झगडा न हुइ जाय, काहे ते हमरी समझ ते यहि बियाहे मा बाँभन टोले वाला कउनो सामिल न होई..।

या सब बात बादि कि आय पहिले चन्दा ते पूछि लेव। ..बाकी जउनु होई तउनु हनुमान दादा ते कहि द्याबै..वुइ अपने आप निपटइहैं।

जउनु खर्चा पानी लागै तउनु पहिलेहे लइ लीन्हेव।

सब बात कइ लीन जायी,पहिले चन्दा क्यार मनु लइ लेव.. फिरि हनुमान दादा अपने आप सँभरिहैं।


संकर औ रजाना दुनहू हनुमान दादा के ई प्रस्ताव ते बहुत मगन रहैं। पंडित हनुमान सुकुल चन्दा की तुलना मा उमिरि मा बडे रहैं,लेकिन का कीन जाय।हनुमान बिधुर रहै औ चन्दा बेवा दुनहू के कउनिव औलादि न रहै। दुनहू जवान रहै,बेवा औ रणुआ कि जिन्दगी

कउनिव जिन्दगी है- नकटा जीवै बुरे हवाल।गाँव समाज मा अबहिउ अइसी मेहेरुआ का अपसकुनी कहा जाति है।कउनेव कामे काजे मा बेवा मेहेरुआ का सबते पाछे धकियाय दीन जाति है ,मानौ वा कोई चंडालिनि होय। तेलियन के बिसय मा पंडित कबिता बनायेनि है - सुभ यात्रा के समय जो कहूँ तेली सामने आय जाय तो समझौ मौत निस्चित है--

इकला हिरना,दूजा स्यार

ग्वाला मिलै जो भैस सवार

तीनि कोस तक मिलै जो तेली

समझौ मौत सीस पर खेली।

गाँव समाज मा पढे-बेपढे हर तरह के पंडित होति हैं- तीमा पूजा-पाठ करावै वाले पंडित जादातर प्वाँगा होति हैं।उल्टा सीध संस्कीरत बाँचै लागति हैं बसि। अडोम- गडोम स्वाहा कइकै अपनि दच्छिना धरवाय लेति हैं। फिरी वहि दिन का पूछैक--खाना मा खीर पूरी मिलि जाति है,यहे बदि कुछु न कुछु तीज- त्यौहारु-बरतु बतावै करति हैं ।अइसे प्वाँगा पंडितन ते भगवानै बचावै। गाँव के तमाम पढे-बेपढे अबहिउ इनके इसारे पर चलति हैं। दौलतिपुर मा पंडित गिरिजा परसाद मिसिर पूजा पाठ ,किरिया-करम करावति रहैं। यहि तना की उलटी टेढी बातै यहे पन्डितउनू कीन करति रहैं।

चन्दा भइसिया का चारा पानी कइके घर मा घुसी तौ रजाना वहिका पकरि के लपटाय लीन्हेनि।चन्दावती अचकचाय गय,कुछु समझि न पायी। भौजी नन्द का चूमै लागि रहै।अपने भइया भौजी पर बोझु बनी चन्दा का यू सबु समझि मा न आवा। सालु भरि पहिले जब बिहाव भा रहै तबहूँ रजाना यहि तना चन्दा का न चूमेसि रहै। बडी देर तके रजाना चन्दावती का भेटती रहीं।आखिर चन्दा ते न रहा गवा पूँछेसि-

का भवा भौजी?...कुछु बतइहौ कि ...बसि गले लगाये रहिहौ।

अरे,चन्दा तोहारि किस्मति जागि गै...

का,भवा भौजी!..का सुमेरुपुर वाले....

वुइ नासपीटे दाढीजारन क्यार नाव न लेव....

फिरि का कउनिव लाटरी लागिगै है ?

तुम यहै समझि लेव चन्दा!...

भौजी,पहेली न बुझाओ कुछु खुलासा करौ।

हनुमान दादा का ? ... जनती हौ?

अब हनुमान दादा -क का हुइ गवा? उनका को नही जांनति?

वै तुम्हार हाथु माँगेनि है....

हमार.....हाथु...

हाँ,तोहार हाथु।..तुम उनके मन भाय गयी हौ। तोहार दद्दू अबही उनका सँदेसु लाये हैं।

हम तौ उनका नीक मनई समझिति रहै...

का भवा?..उनमा का खराबी है।

हम अइसेही ठीक हन।...कोहूकि रखैल बनिके न रहबै।

यू का कहती हौ? बिटिया!...हनुमान दादा बियाहु करै खातिर तयार है

भउजी,यू बियाहु तौ बहाना है।...ई लरबहे बँभनन क्यार..

कइसे?..

बाँभन टोले वाले हमका जियै न द्याहैं। कमलेस तेवारी औ मिसिर महराज क्यार विनोद .दुनहू पहिलेहे हमरे पीछे परे हैं।

अरे,इनकी सबकी परवाहि न करौ।ई सब तौ बियाहे धरे है....लेकिन हनुमान दादा की दुलहिनि तौ खतम हुइ गयीं।उनके कउनिव औलादिउ नही है,आगे पूरी जिन्दगी परी है।तोहार भइया बतावति आँय कि हुनुमान दादा केरि उमिरि पैतिस ते जादा न होई।.. .

भउजी,खाली उमिरि कि बात नही है।...कहाँ हम बेवा तेलिन कहाँ वइ बीस बिसुआ के कनवजिया बाँभन,अच्छे किसान वुइ,पहेलवान वुइ-उनकी तौ बडी नाक है।...कस होई..यू बिहाव,.हमरी बदि गाँव म झगडा लडाई होय यू हम नही चहिति।..नरसिंह भगवान हमका जउनु गोरि चमडी औ रूपु दिहिनि है वहै हमार दुसमन है।


रजाना चन्दावती क्यार मुँहु देखतै रहि गय। फिरि वहिका मुँहु सोहरावै लागि,तीके छाती ते लगाय के कहेसि -तू तौ बहुतै सयानि हुइ गय रे।...द्याखौ,जउनु कुछु होई तउनु बाँभन टोले म होई।

..नाही भउजी,परेसानी हमरे घर-परिवार-औ सब खानदानिन केरि बढि जायी।

फिरि कस होई यू बियाहु...हम चहिति रहै कि तोहार घरु बार होतै...

द्याखौ, हनुमान दादा के घरउआ औ टोले वाले जब उनका याक दाँय गरियैहैं तब हमका औ हमरे घरउवन का दस दफे गरियैहै झगडा,मारपीट,कतल कुछौ हुइ सकति है।...गाँवै क मामिला है,दूरि होतै तबहू तके ठीक रहै।..

फिरि का होई ?...फिरि कैसे होई बिटिया?...हनुमान दादा तौ नीक मनई हैं।..

तौ अइस करौ कि पहिले हनुमान दादा का हमरे घरै बोलाय लेव,सब जने मिलिकै उनते साफ-साफ बात कइ लेव। उनके जिउ मा का है सब जानि लेव।..हमारि हैसियत उनकी जिन्दगी मा का होई,उनके घर मा का होई,काल्हि जो लरिका बच्चा पैदा हुइहै तौ उनका घर जादाति मा कुछु हक होई कि न होई?...हम रखैल कही जाब कि उनकी दुलहिनि,ई सब बातै पूछि लेव।

रजाना कि आँखी खुलि गयीं,कहेसि—‘वाह,बिटिया तुम तौ याक-याक बात साफ कइ दीन्हेव। मोर जिउ खुस हुइगा ।


रजाना के तीनि बिटिया औ एकु लरिकवा रहै। सब के सब अबही नान्ह रहैं,बडकवा मुस्किल ते दस साल-क होई। आजु सब कोल्हउरे ते ताजा गुडु लाये रहैं।...असलियत मा ठाकुर दादा केरि ऊँख पेरी गय रहै,उनहिन क्यार गुडु बनति रहै,हर दफा उनका दुइ याक पारी गुडु तौ परसाद तना बँटि ही जाति है।चन्दावती के घर के बगलैम रहै कोल्हउरु...घर मा ताजे गुडु की खुसबू भरि गै रहै। बडी सोंधि होति है ताजे गुडु की खुसबू। का लरिका का बडे-बूढ सबकी जबान लटपटाय जाति है।चन्दावती के घरमा वहै सोंधि खुसबू भरि गय रहै।...मानौ गाँवम कहू बिसाल जग्य़- हवन भवा होय। --रजाना लरिकवा के हाथे ते तिनिकु गुडु लइकै चन्दावती के मुँहमा डारि दीन्हेसि

मँहु मीठ कइ लेव, अब जउनु नरसिंग भगवान करिहै...तउनु नीक करिहैं।...बिटिया तुम चिंता न कीन्हेव। तोहरे दद्दू ते सब तय कराय लीन जायी।

ठीक है भउजी हमका कउनिव चिंता नही है।

चारिव लरिका गुडु चाँटि-चाँटि नाचति रहै। छोटकवा अबै ठीक ते चलि न पावति रहै तेहूँ नान्हि कि हथेली पर तिनुक गुडु धरे आँगन मा ड्वालै लाग रहै। रजाना औ चन्दा सबु देखि कै अपनी खुसी ते झूमै लागीं।

अँधेरु होय लाग रहै।तिनिक देर बादि रजाना चउका मा जाय कै ढेबरी जलाय दीन्हेसि। तब दौलतिपुर जइसे गाँवन के घरन मा बिजुली न रहै। बिजुली आय गय रहै लेकिन बसि चक्की-इस्पेलर-टूबेल चलै लाग रहै। दौलतिपुर मा परधान दादा के टेबुल पर यू सब इंतिजाम हुइगा रहै। बिजुली दिन मा पाँच-छ घण्टा ते जादा न आवति रहै। अब अतना हुइगा रहै कि गाँव मा पिसनहरिन क्यार कामु कम हुइगा रहै,तेलिन क्यार कामु तकरीबन खतम हुइगा रहै। टेम-बेटेम जब बिजुली होय तौ पानी मिलि जाति रहै। दौलतिपुर मा अब हर टेम कुछु न कुछु हरियाली देखाय लागि रहै। गाँवै मा हरी ताजी तरकारी मिलै लागि रहै।

रजाना बगल के घर ते लउकी लइ आयी रहै। चन्दावती सिलौटी पर मसाला पीसै लागि ,रजाना तरकारी काटि लीन्हेसि,फिरि चन्दावती आँटा माडै लागि रजाना तरकारी छौंकिसि तीकै चन्दावती पनेथी पोय लीन्हेसि। दूनौ नन्द भउजाई यही तना कामु निपटाय लेती रहै,पता नही का मामिला रहै कि नन्द भउजी मा अतना पियारु बहुत कम द्याखै क मिलति हैवहौ जब नन्द बेवा होय..

आजु तौ अइसेहे कुछु मन की खुसी बढिगै रहै। लेकिन चन्दावती बहुतै सावधान रहै ..वा पढी तो पाँचै दर्जा रहै तेहूँ बुद्धिमानी मा अव्वल रहै। राति मा संकर रजाना ते पूछेनि- का कहेसि चन्दा?

चन्दा कहती है कि हनुमान दादा का घरै बोलाय लेव ...तो उनते सब बात कइ लीन जाय ,कहती हैं हम रखैल बनिकै न रहि पइबे।

या बात तो ठीक है।...काल्हि बोलाय लीन जायी। तीनिउ जने बैठिके उनते मसबिरा करिबे तब फैसला कीन जायी।

रजाना फिरि न जानै अउरु का का कहति रहिगै ..संकर सोय गे। फिरि रजाना जब जानेसि कि संकर सोयगे तो वहौ चुपाय रही। छोटकन्ना रजाना के अँचरे मा मुँहु मारै लाग। रजाना वहिका दूधु पियावै लागि। तीनिव बिटेवा सोय गयी रहै। तीनिव बिटेवा चन्दा के साथ बरोठेम पइरा पर कथरी बिछाय के स्वउती रहैं।

दुसरे दिन संकर हनुमान दादा ते सबु हाल बतायेनि। हनुमान दादा पहिलेहे कहि चुके रहैं। वुइ संकर के साथ वहिके घरै आयगे।

हनुमान दादा चन्दावती ते पूछेनि-हाँ तो बताओ चन्दा?...तुम का चहती हौ?

की बिधि करिहौ हमते बिहाव। पंडित जी महराज!, अपनी बिरादरी औ घर वालेन ते का बतइहौ?...तेलिन के घरते बँभनन कि रिस्तेदारी तौ हम कबहूँ सुना नही।

हनुमान दादा क्यार सबु ज्ञान भुलाय गवा बिचारे आँखिन ते भुँइ ख्वादै लाग....फिरि खाँसति खखारति भये कहेनि-

हमरे घर वालेन कि चिंता तुम काहे करती हौ।

...तो फिरि अउरु को करी ? हमारि हैसियत तुमरे घर मा का होई?....रोजु गारी खायी,अउरु तुमरी रखैल कही जायी...वहिते तौ हम बेवै ठीक हन।

हनुमान दादा केरि पहेलवानी भुलाय गय,फिर लार घूँटति भये कहेनि-

द्याखौ चन्दावती,यू जानि लेव कि इंसान अपनि जुम्मेदारी लइ सकति है।..पूरे गाँवसमाज औ जवारि कि जुम्मेदारी कोऊ नही लइ सकति। ..हम अपने घर केरि जुम्मेदारी लइ रहेन है-काहे ते हम अपने घर के मुखिया हन.अबहीं हमारि द्याह दसा ठीक है।

लेकिन हमरे ऊपर तुम्हारि दादागीरी न चली। हम तुमका महराज कहिबे।

तो हम तुमका महरानी कहा करब। ..सब जने हँसै लाग।

चन्दा फिरि बोली-

की बिधि करिहौ हमते बिहाव ...बेवा मेहेरिया क्यार बिहाव तौ कबहूँ न सुना न द्याखा गवा... ।

तुम चिंता न करौ , बिहाव नारसिंघन कि कूटी पर होई।

नारसिंघन की कूटी पर काहे?..

भगवान नरसिंघ हमरे बिहाव के साक्षी हुइहै।..उनहिन के सामने पंडित जी करवइहै हमार बियाहु।

महराज, यू जानि लेव कि पथरन के भगवान कउनिव जरूरति होई तौ गवाही न द्याहै। कुछु गाँवौ के जिन्दा मनई होयक चही।

कुछु तुम्हरे घर के ,कुछु हमरे घर के,परधान रामफल दादा अउरु गाँव के दस पन्दरह मनई-मेहेरुआ हुइ जइहै।...अउरु जरूरति होई तौ..

अतने गवाह बहुत है।...अब यू बताओ महराज कि जो काल्हि हमार लरिका बच्चा होई तो वहिका तुमरी जमीन जायदाति मा हकु होई कि नही।चन्दावती के सब सवाल हनुमान महराज पर भारी परे लेकिन का कीन जाय अब वुइ अपन सबु कुछु हारिगे रहै। कहेनि-काहे न होई?...हमरे जीते जी तुम जइस चहिहौ तइसै होई...निस्चिंत हुइ जाव।


चन्दावती के जिउ मा जउनु आवा तउनु सबु पूँछि लीन्हेसि।वहिका कउनौ डेरु न रहै।कहेसि-

औ तुमरे बादि का होई ,हमरे लरिका बच्चन क्यार हकु मिली कि न मिली।

युहु स्वाल बडा कठिन रहै,हनुमान महराज चारिव खाना चित हुइगे...जबान लडखडाय गय--

जब लरिका बच्चा .....हुइहैं तब उनहुन क्यार ..सबु..हकु मिली।..अब हमारिव बात सुनि लेव- बियाहे के बादि हमका याकौ दिन अकेले न छोडेव।..हमरी तरफ ते तुमका सब हक मिलिहै।

तो ठीक है..महराज ! हमहू तयार हन।

भइया संकर ,द्याखौ अबही गाँव मा केहू ते यहि बात कि चर्चा न कीन्हेव। ...परसों सूकबार के दिन तुम अपने घर के सब लरिका बिटियन का लइके कूटी पर पहुँचि जायेव।..बियाहे कि बात अबही न कीन्हेव,कोऊ पूछै तो कहेव नारसिंघन की पैकरमा पर जाय रहेन है।बियाहे के बादि सबका अपने आप धीरे धीरे पता लागी।

ठीक है दादा।..हम ध्यान रखिबे।

मंगलवार, 5 जुलाई 2011

अवधी लोक के कवि गिरधर कविराय

लोक जीवन के कवि गिरधर की काव्य भाषा अवधी है ऐसा मुझे जान पडता है।आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार उनका जन्म सम्वत-1770 के आसपास हुआ होगा।गिरधर जी कृषिचेतना,नीति वचन,ज्ञान-वैराग्य आदि के कवि माने जाते हैं किंतु उन्होने सोने का व्यापार करने वाले सेठों के घर की व्याकुल नारियों को भी निकट से अपने गाँव जवार मे देखा होगा,इसलिए वो उसकी दशा का भी मार्मिक चित्रण करते हैं।देखें लोक लोक कवि गिरधर की दो कुंडलिया-

1.हीरा

हीरा अपनी खानि को,बार बार पछिताय।

गुन कीमत जानै नहीं,तहाँ बिकानो आय।।

तहाँ बिकानो आय,छेद करि कटि में बांध्यो।

बिन हरदी बिन लौन मांस ज्यों फूहर रांध्यो॥

कह गिरधर कविराय,कहाँ लगि धरिए धीरा।

गुन कीमत घटि गयी,यहै कहि रोयेव हीरा॥

2. सोना

सोना लादन पिव गये,सूना करि गये देश।

सोना मिला न पिव मिले,रूपा हो गये केश॥

रूपा हो गये केश,रोय रंग रूप गँवावा।

सेजन को विस्राम,पिया बिन कबहुँ न पावा॥

कह गिरधर कवि राय,लोन बिन सबै अलोना।

बहुरि पिया घर आव,कहा करिहौ लै सोना॥

मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011

आज जनकवि अवधी के निराला पं.बंशीधर शुक्ल की 107 वी जयंती है। प्रस्तुत है शुक्ल जी की एक मार्मिक कविता। देखिये तबसे अब तक किसान की दुनिया में क्या बदला है।

यक किसान की रोटी

यक किसान की रोटी,जेहिमाँ परिगइ तुक्का बोटी

भैया!लागे हैं हजारउँ ठगहार।

हँइ सामराज्य स्वान से देखउ बैठे घींच दबाये हइँ

पूँजीवाद बिलार पेट पर पंजा खूब जमाये हइँ।

गीध बने हइँ दुकन्दार सब डार ते घात लगाये हइँ

मारि झपट्टा मुफतखोर सब चौगिरदा घतियाये हइँ।

सभापती कहइँ हमका देउ, हम तुमका खेतु देवाय देई

पटवारी कहइँ हमका देउ, हम तुम्हरेहे नाव चढाय देई।

पेसकार कहइँ हमका देउ, हम हाकिम का समुझाय देई

हाकिम कहइँ हमइँ देउ, तउ हम सच्चा न्याव चुकाय देई।

कहइँ मोहर्रिर हमका देउ, हम पूरी मिसिल जँचाय देई

चपरासी कहइँ हमका देउ, खूँटा अउ नाँद गडवाय देई।

कहइँ दरोगा हमका देउ, हम सबरी दफा हटाय देई

कहइँ वकील हमका देउ, तउ हम लडिकै तुम्हइ जिताय देई।

पंडा कहइँ हमइँ देउ, तउ देउता ते भेंट कराय देई

कहइँ ज्योतिकी हमका देउ, तउ गिरह सांति करवाय देई।

बैद! कहइँ तुम हमका देउ, तउ सिगरे रोग भगाय देई

डाक्टर कहइँ हमइँ देउ, तउ हम असली सुई लगाय देई।

कहइँ दलाल हमइँ देउ, हम तउ सब बिधि तुम्हँइ बचइबै,

हमरे साढू के साढू जिलेदार।

यक किसान की रोटी,जेहिमाँ परिगइ तुक्का बोटी

भैया!लागे हैं हजारउँ ठगहार।

पं.बंशीधर शुक्ल

शनिवार, 1 जनवरी 2011

समीक्षा
बैसवाडी के नए गीत
भारतेन्दु मिश्र
 
 कविवर चन्द्रप्रकाश पांण्डे के बैसवाडी के नये गीत शीर्षक काव्य संग्रह को पढते हुए मन प्रसन्न हुआ। सौभाग्य से कवि श्री चन्द्रप्रकाश पाण्डे लालगंज रायबरेली के बैसवारा क्षेत्र मे जनमे और उनकी मातृभाषा बैसवारी है इसलिए उन्होने बैसवारी को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम चुना। बैसवाडी या बैसवारी अवधी भाषा की ही एक बोली है। जायसी भी रायबरेली के थे। तात्पर्य यह कि कवि के पास अपनी भाषा मे कविताई करने का बहुत मौका है। कवि के पास जातीय छन्द हैं। गीतो के अलावा पुस्तक मे दोहे घनाक्षरी तथा  बैसवाडी कूट शीर्षक से कुछ फुटकर चौपाइयाँ भी संकलित हैं,अवध मे कूठ बोलने का अर्थ है व्यंग्य करना। कवि ने उसे ही कूट कहा होगा ऐसा अनुमान है। हमारे गाँवों मे आज भी व्यंग्य वचन दोहे और चौपाई के रूप मे चलते हैं।सम्भवत: यह तुलसी जायसी  राधेश्याम रामायण और गडबड रामायण आदि की सतत दीर्घ  लोक परम्परा का परिणाम हो। जिससे कवि की रचनात्मकता के अलावा उसकी प्रयोग क्षमता का भी परिचय मिलता है। दो बैसवाडी कूट देखें-
मंहगाई के बोल अमोल
खटिया खडी बिस्तरा गोल।
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ककुआ कहाँ कचेहरी जाई
झूठि कसम गंगा कै खाई।
 कुछ दोहे भी बडे मार्मिक बन गये हैं।विशेष बात यह भी है कि कवि के पास एक प्रगतिशील सोच भी सदैव विद्यमान दिखाई देती है। एक चित्र देखें-
सास बहू कुस्ती लडैं,बाप पूत मा मारु
कटाजुज्झ घर घर मची,जिनगी हुइगै भारु।
अवधी कविता मे ऐसे काव्य चित्र बहुत कम देखने को मिलते हैं। कवि के पास अवधी की जातीय छ्न्द परम्परा के अलावा अपने घर गाँव के अनुभवों की थाती भी है। गीतों के प्रयोग तो और भी सुन्दर हैं। ओ रे सुखुवा,का कम कीन कमाई,नौकरी सरकारी,फूलन कै कमताली,लरिका सूधे ब्वालति हैं,नकुनन ऊपर पानी,मटका कबौ न रोय,लरिकन बरे लंगोटी का,रामकली आदि गीत तो संग्रह की उपलब्धि कहे जा सकते हैं। हालाँकि प्रूफ की कुछ त्रुटियाँ रह गयी हैं और कहीं कहीं लिखित रूप या कहे कि पाठ्य रूप में छन्द की दृष्टि से मात्राओ की कुछ कमियाँ रह गयी हैं जो सस्वर गीतपाठ करते समय शायद न प्रतीत हों इसके बावजूद कवि की कविताई और अनुभवो की ताजगी मे कोई अंतर नही पडता। अभी अवधी का मानक रूप विकसित नही हुआ है यह भी एक कारण है। श्रव्य रूप मे इन कविताओ की व्यंजना सटीक है। बैसवाडे के गाँव का एक वास्तविक चित्र देखें-
सबते राम जोहार बनी है
लरिका सूधे ब्वालति हैं
पुछतिउ हैं का कबौ बहुरिया
बप्पा रोटी खाय लेव
बडी दूरि ते आयो पाहुन
बइठौ तनि सँहिताय लेव।
अंतत: कवि चन्द्रप्रकाश पाण्डे के इस बैसवाडी के नये गीत शीर्षक काव्य संकलन मे सचमुच बैसवारी या कहे कि अवधी के कुछ नये गीत और नयी प्रयोगधर्मिता अवश्य देखने को मिलती है। आधुनिक अवधी के कविसमाज मे इस पुस्तक का स्वागत किया जायेगा ऐसा मेरा विश्वास है। कवि ने अपनी इन कविताओ के बहाने बैसवाडी बोली के अनेक अप्रचलित शब्दो को पुनर्जीवित किया है। कवि को बधाई।