शनिवार, 4 फ़रवरी 2017





इंतज़ार ख़त्म हुआ-
साहित्य अकादमी विक्रय केंद्र ,नई दिल्ली 

आज पढीस जी पर लिखी किताब साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित होकर आ गयी|संयोगवश आज साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित "तुलसी महोत्सव" में जाने का सुयोग बना और भारतीय साहित्य के निर्माता "बलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढीस'" पुस्तक देखने का सुखद अवसर मिला|आदरणीय प्रो.राधावल्लभ त्रिपाठी जी ने इस पुस्तक का उद्घाटन किया|इस अवसर पर पुस्तक के प्रथम क्रेता मित्र भाई श्याम सुशील जी के साथ यह चित्र सब अवधी प्रेमियों मित्रो के लिए-पुस्तक साहित्य अकादमी के विक्रय केंद्र से खरीदी जा सकती है |मूल्य रु-५०/ है|


सोमवार, 30 जनवरी 2017


यूपी क्यार चुनाव--



चरखा कात रहे मलखान|
रामलला की जयकारा ते बना तिनको काम|
साइकिल पंचर हुइगै,वहि पर बैठे दुइ  नादान |
हैन्डिल लैकै भाग लरिकवा,बापू है हैरान|
नोटन की माला आंधी मा कौनिउ तरफ उड़ान|
हाथी सब पथराय गए है,मिला न कहूँ  ठेकान|
हाथ कट गवा कालेधन मा सीला बिनै किसान|  
रुपया बदलै की लाइन मा खड़े राम रहमान|
कूकुर भौकैं नई योजना की खुलि गयी दुकान |
कैसे होय चुनाव अवध मा मनई  सब बिल्लान| |

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

अवधिये जागो

डा.भारतेंदु मिश्र

अवधी जन भाषा होने के साथ ही पारंपरिक सांस्कृतिक और साहित्य के लोक को आलोकित करने वाली  काव्य भाषा भी है| ,उसमे कई सदियों की रचनात्मक चेतना  का आस्वाद और अवध के लोक जीवन का विपुल साहित्य भरा है|वह भोजपुरी की तरह बाजार से दूर रही|अवध का आदमी भी बाजार से बहुत दूर रहा| रमई काका ने बाजार और बाजारवादी धोखे के बारे में बहुत पहले ही अवध के लोगो को आगाह कर  दिया था—
हम गयन याक दिन लखनउवै , कक्कू संजोगु अइस परिगा |
पहिलेहे पहिल हम सहरु दीख , सो कहूँ कहूँ ध्वाखा होइगा
जब गएँ नुमाइस द्याखै हम , जंह कक्कू भारी रहै भीर
दुई तोला चारि रुपइया कै , हम बेसहा सोने कै जंजीर ||
लखि भईं घरैतिन गलगल बहु , मुल चारि दिनन मा रंग बदला |
उन कहा कि पीतरि लै आयौ , हम कहा बड़ा ध्वाखा होइगा || 
इसीलिए उसके पीछे वैसे लोग कभी नहीं रहे जो संगठित होकर अवधी के लिए संघर्ष कर पाते| अवधिये ज्यादातर संकोची घुन्ने और चुपचाप काम करने वाले होते हैं|सरकारे उन्हें वोट बैंक बनाती हैं ठगती हैं लेकिन ये कभी संगठित होकर सरकारों से अपने जातीय स्वाभिमान के लिए नहीं लडे | आगे भी लड़ने की सामर्थ्य नहीं है| असल में हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने वाले अग्रणी हिन्दी के साहित्यकारों वाले  समाज के लोगो में लोक भाषा अवधी की कभी बहुत चिंता भी नहीं की| इसी कारण आठवी अनुसूची में अवधी को शामिल कराना अवधियो का लक्ष्य ही नहीं बना| बहरहाल इस मुद्दे पर विचार तो करना ही चाहिए|अवधी की ही तरह ब्रज और बुन्देली जैसी लोक भाषाओं का  भी हिन्दी पट्टी  में बड़ा महत्त्व है| मेरी समझ से ये आठवी अनुसूची में शामिल होजाने की कवायत सही कदम नहीं है| बिना आठवी अनुसूची में शामिल हुए भी हम सब अवधी का विकास करने का संकल्प कर सकते हैं |
जहा तक अवधी में पढ़ाने लिखाने सिखाने की बात है तो सन २००५ में शिक्षा को लेकर  पुनर्विचार के लिए यशपाल कमेटी की जो रिपोर्ट आयी उसमे भी यह माना गया था कि प्राथमिक स्तर पर बच्चो को अपनी मातृभाषा में ही शिक्षा दी जाए|करोडो अवधी क्षेत्र के लोगो की मातृभाषा अवधी भाषा है | अब प्रश्न यह था कि जिन बच्चो की भाषा अवधी/ब्रज या भोजपुरी है जो आठवी अनुसूची में नहीं आती तो उन्हें प्राथमिक स्तर के बच्चो के लिए शिक्षा का माध्यम कैसे बनाया जाए| इस प्रश्न का उत्तर हमें शिक्षा का अधिकार कानून-२००९ ने दिया| इस क़ानून के हिसाब से विद्यालय के अभिभावकों और अध्यापको को स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप पाठ्यचर्या में बदलाव करने के अवसर प्रदान कर दिए है| तात्पर्य यह कि यदि किसी गाँव के बच्चे यदि अवधी माध्यम से पांचवी तक पढ़ना चाहे तो ये उनका अधिकार है|इसके लिए आठवी अनुसूची में अवधी को शामिल करने/करवाने  की अनिवार्यता नहीं है|      
दूसरी ओर हमें मिलकर अवधी गद्य के विकास पर ध्यान देने की जरूरत है|
अवधी ब्रज आदि बोलिया भी है और प्राचीन लोक भाषाए भी है|हिन्दी के स्वीकार के कारण इन्हें उपभाषा के रूप में सीमित कर दिया गया| लेकिन जब इन सभी लोकभाषाओ की अकादमिया बन जायेगी तो इन भाषाओं का विकास तय हो सकेगा| बहुत आवश्यक हो तो आठवी अनुसूची की बात के बारे में आगे कभी तय होगा|अभी तो इनके संरक्षण की बात है| एक अध्ययन केंद्र तक बना नहीं, कोई साप्ताहिक अखबार तक नहीं निकला, कोई मासिक पत्रिका तक नहीं निकली| अवध ज्योति के अलावा दूसरी ढंग की पत्रिका तक नहीं निकल रही है लोग  कहते है - भाषा बन गयी| सरकार बस उसे भाषा के रूप में मान्यता दे दे|मेरा प्रश्न ऐसे लोगो से है कि  आठवी अनुसूची में शामिल होने से क्या हो जाएगा ? कुछ लोग जो इन भाषाओं की धंधेबाजी में शामिल होंगे वो कुछ पुरस्कार आदि ले मरेंगे..बस जिन भाषाओं को आठवी अनुसूची में शामिल किया गया है उनकी स्थिति बहुत अच्छे नहीं है|भाषा होने के लिए गद्य के विविध  प्रयोग किये जाने की अनिवार्यता है| गद्य के लिए व्याकरण की अनिवार्यता है| हमने और अलग भाषा के समर्थको ने  कितना काम अवधी के लिए किया है ? तो इस मुद्दे पर गंभीर विमर्श होना चाहिए|  सबको विचार करने की आवश्यकता है| अवधी में समाचार पत्र निकालने पर गंभीर होना चाहिए| संस्कृत में दैनिक अखबार निकल रहा है तो अवधी में क्यों नहीं निकल सकता ?..यह चन्द फेसबुक  के समर्थको से बात नहीं बनेगी|
संपर्क:
सी/४५ /वाई-४,दिलशाद गार्डन ,दिल्ली -११००९५

मंगलवार, 8 नवंबर 2016


उपन्यासों पर समीक्षात्मक टिप्पणियाँ ---
नई रोसनी :समीक्षात्मक सामग्री


चंदावती :समीक्षा -विनोद कुमार 











चंदावती  पर डा.गुणशेखर की टिप्पणी--



सोमवार, 7 नवंबर 2016


कस परजवटि बिसारी :समीक्षात्मक सामग्री
1 .सुशील सिद्धार्थ की टिप्पणी  




2 .दैनिक जागरण 




.3 दैनिक हिन्दुस्तान की कटिंग--(समीक्षक-कमल किशोर श्रमिक ) 
और .इंडिया टुडे की कटिंग(समीक्षक-लक्ष्मी शंकर बाजपेयी ) 

4.राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित समीक्षा-सुशील सिद्धार्थ 



5  .कमलकिशोर श्रमिक जी का पूरा लेख --












सोमवार, 10 अक्टूबर 2016

साधौ,आपन करम बिचारो|

दूर करो परजा के सब दुःख अपने मन का रावण मारो|
सांपिन सत्ता  की केचुल का अपने हाथ उतारो|

आगि लगि चुकी है लंका मा
सबका  पौरुख है संका मा
एफडी आई की ठंडाई
पूरे घर के काम न आयी  
दस मुंडी दस मुकुट धरे हौ इनका तनिक उघारो |

अहंकार का अमिरितु छानेव
हित अनहित की बात न मानेव
दौड़ धूप, मेहनति खुब कीन्हेव  
सही राह अब लौ ना चीन्हेव
अपनी रास्ता के पहाड़ लांघो पथ अपन बहारो|
@ भारतेंदु मिश्र 



  

शनिवार, 17 सितंबर 2016

पगलौनू आल्हा गावति  हैं



पहिले लछमिनिया पैदा भइ
तउ  हुइगा उनका मुख मलीन
दउआ के लरिका भये  तीन
सकटू –गिरिजा औ गयादीन|


सब बड़ी जतन  ते पाले  गे
अच्छे  वाले बिद्यालय गे
हुसियार रही लछमिनिया मुलु
वा चौका चूल्हे मा खपि गै|

लरिका बिद्यालय मा पढिकै
अंगरेजी बिद्या सीखि  लिहिन
दउआ की कौनौ सुनेसि  नहीं
सब अपने आप बिहाव किहिन|

सब खेती पाती बेंचि खोंचि
वुइ राई रत्ती बांटि लिहिन
आपसै मा लडिकै दीमक जस
अपनी देहरी का चाटि लिहिन |

जब ते भौजी परलोक गयीं
दउआ पीपर जस हरहरांय
जिउ कहूं न लागै ट्वाला मा
मन मा झरसै तन मा बुतांय |

सब लरिका आपन हिस्सा लै
दिल्ली कलकत्ता भाजि  गये 
लछमिनिया बिटिया याक रही
बसि  वहै सहारा बनि गइ  है|   


रहिगे अकेल वुइ  खडहर  मा
घरु पुरखिन बिना रहै सूना
खटिया पकरे पगलान बैठ
अब हुइगा उनका दुःख दूना |

सस्ते मा लछमी का बिहाव
दउआ निपटायेनि रहै मुला
पौरुखु घटिगा थकि रही सांस
अब तौ रहिगा बसि चली चला |

बिटिया के मन मा टीस नहीं
वा सेवा भाव जनावति  है
खांसी बोखार का पता चलै
तौ दौरि धूपि घर आवति है|

लरिका कौनौ सुधि लेत नहीं
पगलौनू आल्हा गावति  हैं
लछमी की सेवा ते दउआ की
आंखि रोज भरि आवति है|
10/9/2016 @भारतेंदु मिश्र