शनिवार, 10 फ़रवरी 2018

 अवधी सम्राट जनकवि :वंशीधर शुक्ल
# डॉ.भारतेंदु मिश्र

                                                                 (जन्म: 1904; मृत्यु: 1980)
‘कदम कदम बढ़ाये जा /खुशी के गीत गाये जा
ये जिन्दगी है कौम की तू कौम पे लुटाये जा|’
-जैसे लोक विख्यात कौमी तराने लिखने वाले कवि का जन्म वर्ष 1904 में वसंत पंचमी के दिन हुआ|इनके पिता पं॰ छेदीलाल शुक्ल सीधे-सादे सरल कवि ह्रदय किसान थे जो अच्छे अल्हैत के रूप में विख्यात थे और आसपास के क्षेत्र में  वे आल्हा गायन के लिए आदरपूर्वक बुलाये  जाते  थे । तब वे किशोर  वंशीधर को भी अपने साथ ले जाया करते थे। पिता द्वारा ओजपूर्ण शैली में गाये जाने वाले आल्हा को वंशीधर मंत्रमुग्ध होकर सुनते थे। सामाजिक सरोकारों से वंशीधर जी के लगाव के पीछे उनके बचपन के परिवेश का बहुत बड़ा योगदान था। सन 1919  में पिता पं॰ छेदीलाल चल बसे। 15 वर्षीय   वंशीधर पर पारिवारिक जिम्मेदारियों का भी बोझ आ गया  था। यह उनके लिए कड़े संघर्ष का समय था। अवधी और खड़ीबोली हिन्दी में एक साथ जन जीवन की कविताई करने वाले पंडित वंशीधर शुक्ल बीसवीं सदी  के उन चंद कवियों में से एक हैं जिनका जीवन उनकी ही कविताओं की तरह ईमानदारी से देखा परखा जा सकता है|अर्थात जिनके मन वचन और कर्म में कोई अंतर नहीं दिखाई देता| वे सच्चे स्वतंत्रता सेनानी और किसान कवि  थे और अंत तक किसानों के स्वाभिमान के लिए संघर्ष करते रहे| साम्राज्यवादी ताकतों के प्रतिनिधि सामंतों और नेताओं से भी उनका लगातार संघर्ष चलता रहा| स्वतंत्रता संग्राम में वे उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी  जनपद के नायक के रूप में उभरे| इसी समाज में जहां बलभद्र प्रसाद दीक्षित ‘पढीस’ जैसे विख्यात अवधी के कवि जनमे उसी परिवेश में उनके उत्तराधिकारी के रूप में वंशीधर जी का जन्म हुआ| ख़ास बात यह कि वंशीधर जी की कवितायेँ हास्य - परिहास अथवा मनोरंजन की दृष्टि से नहीं लिखी गयीं बल्कि उनकी कविता का स्वर आक्रोश और करुणा से परिपूरित है| वे सही मायने में अपने समाज को अपनी कविताओं से जगाना चाहते हैं|उनकी क्रांतिकारी चेतना की कवितायेँ कोटि कोटि जन जन का कंठ हार बनीं|प्रारंभ में वे सीतापुर के नैमिषारण्य तीर्थ स्थल  के अमावस्या के मेले में गा गाकर पुस्तकें बेचते थे|तभी उन्होंने ‘मेला घुमनी ’और ‘चुगल चंडालिका ’ जैसी लघु पुस्तकें लिखीं ये पुस्तकें 10 या 12 पैसे की होती थीं और मेले में खूब बिकती थीं|इसी क्रम  में  - ‘कृषक विलाप ’और ‘मतवाली गजल ’ जैसी पुस्तकें लिखीं| यदा  कदा  उन्हें पुस्तक बेचने के सिलसिले में कानपुर जाना पड़ता था | इन्ही दिनों कानपुर में वे गणेशशंकर विद्यार्थी जी के संपर्क में आये| अब वे पुस्तक विक्रेता की अपेक्षा कांग्रेस के वालेंटियर बन गए थे| गणेशशंकर विद्यार्थी जी से संपर्क केबाद उनके ही आदेश से शुक्ल जी ने ‘खूनी पर्चा ’नामक क्रांतिकारी कविता लिखी|वर्ष 1926 में यह उनकी कविता कोटि कोटि जन तक पहुँच गयी थी|इसी वर्ष कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पास हो चुका था|चारो ओर क्रान्ति की रणभेरी बज रही थी|लखीमपुर में शुक्ल जी के साथी बम बनाने के आरोप में जेल चले गए तब इन्होने जनपद की क्रान्ति की मशाल को आगे बढाया|इन्हें भी पकड़ा गया और क्रांतिकारी साहित्य के प्रचार प्रसार के जुर्म में इन्हें भी 6 माह की जेल हुई|तब जेल से ही शुक्ल जी ने अपने बड़े भाई को कविता में पत्र लिखा-
धैर्य धरो जेलर ससुर की सुता के साथ
चंद दिन में ही तो स्वराज लिए आते हैं|
सन 1925 से पहले ही शुक्ल जी अपनी कविताई के लिए विख्यात हो चुके थे|इसी वर्ष लिखी उनकी कविता कोटि कोटि जन मानस के लिए जागरण गीत साबित हुई | ‘उठ जाग मुसाफिर’ शीर्षक जागरण गीत भी उन्ही का लिखा हुआ है जो महात्मा गांधी जी की प्रार्थना सभा में,प्रभात फेरियों में  और जेल में बंद हजारों स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों द्वारा प्रतिदिन गाया जाता था | स्वाभाविक है कि सन 1925 में लिखे इस गीत से ही शुक्ल जी का साहित्यकारों में मान सम्मान भी बहुत बढ़ गया था-
उठ जाग मुसाफ़िर भोर भई
अब रैन कहा जो सोवत है
जो सोवत है सो खोवत है
जो जागत है सो पावत है
उठ जाग मुसाफ़िर भोर भई
अब रैन कहा जो सोवत है
तू नींद से अंखियां खोल जरा
पल अपने प्रभु से ध्यान लगा
यह प्रीति करन की रीति नही
जग जागत है तू सोवत है

तू जाग जगत की देख उडन,
जग जागा तेरे बंद नयन
यह जन जाग्रति की बेला है
तू नींद की गठरी ढोवत है

लडना वीरों का पेशा है
इसमे कुछ भी न अंदेशा है
तू किस गफ़लत में पडा पडा
आलस में जीवन खोवत है

है आज़ादी ही लक्ष्य तेरा
उसमें अब देर लगा न जरा
जब सारी दुनियां जाग उठी
तू सिर खुजलावत रोवत है|
दूसरी ओर सन 1930 में लिखा शुक्ल जी का निम्नलिखित गीत कैप्टन रामसिंह द्वारा किये गए अपेक्षित परिवर्तनों के बाद सुभाष चन्द्र बोस जी की आजाद हिन्द फ़ौज का मार्चिंग सांग बना “  कदम-कदम बढायें जा खुशी के गीत गाये जा जैसी कालजयी रचना का सृजन करने वाले वंशीधर शुक्ल हैं। हालाकि बाद में इसी मुखड़े को लेकर एक गीत कैप्टन रामसिंह द्वारा आजाद हिन्द फ़ौज के लिए भी लिखा गया था|इन दोनों गीतों में मुखड़ा तो एक ही है लेकिन बीच के अंतरे अलग अलग हैं| बाद में आजाद हिन्द फ़ौज का यही मार्चिंग सांग बना| -
क़दम क़दम बढाए जा
ख़ुशी के गीत गाए जा
ये ज़िन्दगी है क़ौम की
तू क़ौम पर लुटाए जा ।
उड़ी तमिस्र रात है, जगा नया प्रभात है,
चली नई ज़मात है, मानो कोई बरात है,
समय है मुस्कराए जा
ख़ुशी के गीत गाए जा
ये ज़िन्दगी है क़ौम की
तू क़ौम पर लुटाए जा ।
जो आ पडे कोई विपत्ति मार के भगाएँगे,
जो आए मौत सामने तो दाँत तोड़ लाएँगे,
बहार की बहार में,
बहार ही लुटाए जा ।
ऐसी प्रखर राष्ट्रीय रचनाशीलता वाले कवि वंशीधर शुक्ल जी का मान बढ़ता जा रहा था|देश में विभाजन की दीवार उठने लगी थी| ऐसे बहुत कम कवि हुए हैं जिनकी कविताओं की व्याप्ति नरम दल वाले गांधीवादी स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों और क्रांतिकारी गरमदल वाले सेनानियों में सामान रूप से रही हो|कौमी गीत बहुत से लिखे गए लेकिन इस कौमीगीत की बात ही कुछ और है| उनकी इन रचनाओं से यह प्रमाणित  होता है कि वंशीधर जी जनमानस की चेतना और मर्म व्यथा के क्रांतदृष्टा राष्ट्रीय कवि हैं|इसी क्रम में जब देश का विभाजन होने की नौबत आयी तब भी शुक्ल जी ने कविता लिखी-‘बनाओ मियाँ! न पाकिस्तान/देश हो जाएगा वीरान|’ नेहरू और रफ़ी अहमद किदवई को भी शुक्ल जी कवितायें बहुत पसंद थी| उन्ही दिनों लिखा गया उनका चरखा गीत भी बहुत प्रचलित हुआ था-
‘मोरे चरखे का न टूटे तार ,चरखवा चालू रहै |
दुलहा बनिके गांधी जी चलिबे दुलहिन बनी सरकार
चरखवा चालू रहै |’
सन 1925 में शुक्ल जी ने ‘विचित्र सती’ शीर्षक कविता में दिल्ली के शहीद भाई बालमुकुन्द की पत्नी रामऋषी देवी के बलिदान की काव्यात्मक कथा लिखी है|सन 1912 में चांदनी चौक, दिल्ली में  वायसराय लार्ड होर्डिंग पर हमला हुआ था|उसकी सजा में मोरिस नगर के पास बालमुकुन्द,वसंत कुवर ,अमीरचंद, और अवधबिहारी पकडे गए और इन्हें फांसी दी गयी थी| बाद में रामऋषी  ने पति की याद में आत्मदाह करा लिया था|  इसके अलावा भीखमपुर में जन्मे अमर शहीद राजनारायण को लेकर लिखी गयी उनकी कविता बेहद मार्मिक ही नहीं ऐतिहासिक महत्त्व की भी है|
ग्राम स्वराज और ग्रामीड़ भारत की अर्थव्यवस्था पर सही अर्थों में विचार करने वाला गांधी जी के सामन कोई दूसरा नहीं हुआ| वंशीधर जी इसीलिए उन्हें अपना आदर्श मानते थे| जीवन भर उनके सिद्धांतों पर चलने का कार्य भी उन्होंने किया|गांधी जी के देहांत के बाद पूरे देश में जो एक शोक की लहर व्याप्त हुई उस पीड़ा को स्वर देते हुए वंशीधर जी कहते हैं-
हमरे देसवा की मँझरिया ह्वैगै सूनि,
      अकेले गाँधी बाबा के बिना।
कौनु डाटि के पेट लगावै, कौनु सुनावै बात नई,
कौनु बिपति माँ देय सहारा, कौनु चलावै राह नई,
को झँझा माँ डटै अकेले, बिना सस्त्र संग्राम करै,
को सब संकट बिथा झेलि, दुसमन का कामु तमाम करै।
      सत्य अहिंसा की उजेरिया ह्वैगै सूनि,
      अकेले गाँधी बाबा के बिना।
महात्मा गांधी उस समय के भारत के जनमानस के एक मात्र निर्विवाद सबसे बड़े नेता थे|उस समय के प्राय:सभी कवियों ने किसी न किसी रूप में महात्मा गांधी जी को अपनी कविताई का विषय अवश्य बनाया| इस समय के कविसम्मेलनों में उनकी अनेक रचनायें बहुत प्रसिद्द हुई|उन दिनों कविसम्मेलनों में सूर्यकांत त्रिपाठी निराला,गयाप्रसाद शुक्ल सनेही ,हरिवंश राय बच्चन ,गोपाल सिंह नेपाली ,बेधड़क बनारसी,श्यामनारायण पाण्डेय,जानकीवल्लभ शास्त्री,बलबीर सिंह रंग,शिशुपाल सिंह शिशु,और अनूप शर्माजैसे कवि मंचपर अपनी कविताओं से धूम मचा रहे थे| सन 1938 में उन्होंने  कुछ समय केलिए पन्त जी के कहने पर आकाशवाणी में नौकरी की लेकिन अग्रेजियत के वातारवण में मन न लगा और खिलाफत आन्दोलन के चलते वह नौकरी भी छोड़ दी|
अपने समय के साथ चलते हुए वंशीधर शुक्ल जी ने महात्मा गांधी के आन्दोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया । किसानी ही उनकी आजीविका का मुख्य साधन था|देश को  स्वतंत्रता मिलने के बाद वे   उत्तर प्रदेश  के  लखीमपुर खीरी विधान सभा से 1952 से 1962 तक विधायक भी रहे। अपने परिवार को सुविधा संपन्न करना तो बहुत दूर ,विधायक  रहने के बावजूद अपने जीते जी अपना पक्का घर भी न बनवा सके|उनकी चेतना में व्यक्तिगत सुविधा जैसा विचार ही न था | जीवन बिल्कुल खुली किताब जैसा था|लेकिन लगातार किसानों की उपेक्षा और कांगेस में दलीय विचलन के कारण उन्होंने राजनीति में आगे सक्रिय रहने का विचार त्याग दिया,लेकिन उनका लेखन चलता रहा| वो समझ चुके थे कि ये वो कांगेस नहीं है,जो साम्राज्यवादी ताकतों से लड़ने के लिए संगठित हुई थी स्वतंत्रता के बाद जिसे महात्मा गांधी भंग करने की बात कर रहे थे | शुक्ल जी गांधीवादी नेता सामाजिक कार्यकर्ता और कवि के रूप में स्वतंत्रता आन्दोलन से ही विख्यात हो चुके थे|जब वे अपने समाज की दयनीय दशा देखकर आक्रोश से भर जाते हैं तभी लिखते हैं-
ईंट किसानन के हाड़न की/लगा खून का गारा
पाथर अस जियरा किसान का /चमक आंख का तारा
लगी देस भगतन की चरबी/चिकनाई जुलमन की
घंटा ठनकइ  अन्यायिन का/कथा होय पापन की |
जहां बसै ऊ जम का भैया/खाय खून की रोटी
हुवै बनी बूचड़खाना असि यह राजा की कोठी|
तात्पर्य यह कि सामंतो और राजाओं की कोठियों की दीवारों में किसानों हड्डियां ईटों की तरह उनके खून के गारे से चिपकायी गयी हैं|उनमें जड़े  पत्थर वास्तव में किसानो का दिल है| उनकी चमक वास्तव में किसानों की आँखों की चमक है| सामंतों ने किसानों और मजदूरों को धोखा देकर उन्हें हसीन सपने दिखाने का ही काम सदियों से किया है| उन्हें ये राजाओं और सामंतों की कोठियां वास्तव में बूचड़खाने जैसी दिखाई देती हैं|शुक्ल जी के सामने देखते ही देखते नेता सामंतों से मिलकर किसानों और गरीब जनता को लूटने का काम करने लगे तब ऐसी दशा में उनका कांग्रेस से विमुख होजाना स्वाभाविक ही था| सन 1961  में उन्होंने नेहरू को चेतावनी देते हुए कविता लिखी थी जो इस प्रकार है-
ओ शासक नेहरू! सावधान/पलटो नौकरशाही विधान
अन्यथा पलट देगा तुमको/मजदूर वीर योद्धा किसान |
शुक्ल जी की रचनावली बहुत बाद में डॉ.श्यामसुंदर मिश्र मधुप जी के कुशल संपादन में और उनके सुपुत्र सत्यधर शुक्ल के सहयोग से वर्ष 2003 में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ द्वारा प्रकाशित हुई| सत्यधर जी यशस्वी पिता की लीक को आगे बढाते हुए अवधी और हिन्दी  में लगातार लिख रहे हैं|वंशीधर जी का देहांत वर्ष 1980 में हो चुका था|हालाकिं उनके जीवन काल में ही लखनऊ सहित अनेक विश्वविद्यालयों में उनकी कवितायेँ पाठ्यक्रम में शामिल की जा चुकी थीं| तथापि यह कहा जा सकता है कि वंशीधर जी को लेकर जिस प्रकार से हिन्दी और अवधी वालों को काम करना चाहिए था वह नहीं हो सका|अवध के किसानों की बेहतरी की चिंता न तो अवध के सामाजिक कार्यकर्ताओं में दिखाई देती है न अवध के हिन्दी के साहित्यकारों में|यही कारण है की आज भी जब हम जनकवि वंशीधर जी की कविताओं को पढ़ते हैं तो आज भी वे उतने ही प्रासंगिक जान पड़ते हैं|उनका रचना संसार वर्ष 1925 से लेकर 1980 तक फैला हुआ है| किसान की जिन्दगी कैसे बीतती है एक अंश देखिये-
बड़े सबेरे ते हरु नाधई ,जोतइ ,बवइ ,मयावइ
फिरि खारा,खुरपा हंसिया लै चारा घासइ जावइ
दुपहरिया मा चारि पनेथी ,बड़की लोटिया पानी
कबऊ चबेना ,मट्ठा ,सरबत ,अइसइ गइ जिंदगानी |
शुक्ल जी हमारे समय के बड़े किसानवादी और ग्राम्य स्वराज की चेतना वाले जनकवि हैं| किसान चेतना को मार्मिकता से व्याख्यायित करने वाली उनकी प्रमुख कवितायें-किसान बंदना,खेतिहर,किसान की अर्जी,गाँव की दुनिया,ग्रामीण मजदूर, किसान की दुनिया,चौमासा,हुवां कस कस होई निरबाह ,लूक,राजा की कोठी,राम मडैया ,अछूत की होरी,चरवाहा,हरवाहा,बेगारि,भुखमरी,कचेहरी,अम्मा रोटी,धन्य गाय के पूत,पंछिन की आह,बिरवन की बतकही,बनिजरवा,बहिया,कन्या की इच्छा,पाथर बरखा,जंगल की दुनिया,मीलन की दुनिया आदि हैं | ये  अनेक सामाजिक सरोकारों वाली कवितायें उनके किसान मजदूरों के पक्ष में सदैव खड़े रहने की गवाही देती हैं|उनकी कविताओं में एक तो राष्ट्रवादी चेतना है और दूसरा स्वर गरीब किसान मजदूर की विवशता से जुडी जनचेतना है | किसानों मजदूरों के जीवन को व्याख्यायित करने वाली कवितायें कवि के समय को और उसके समाज समझने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं| ग्राम्य प्रकृति के अनमोल चित्र तो स्वाभाविक रूप से शुक्ल जी की कविताई का अलंकार हैं ही शुक्ल जी का जीवंत मनोरम प्रभातचित्रण देखिये-
सविता उवै जोंधैया अथवइ चलइ मंद पुरवइया
कोइली कों कों कुतवा पों पों चों चों करइ चिरइया
बर्ध दुवौ पागुर मा लागे गाय पल्हानि हुंकारइ
टटिया फारे बछरा झांकइ रहि रहि मूडु निकारइ
टेंटे पर लरिका का दाबे मेहरी द्वार बहारइ
बड़का लरिका गेंदु  बनाये सूखे ब्याल उछारइ|   
 पारिवारिक समस्याओं और अभावों के चलते यद्यपि शुक्ल जी की पारंपरिक शिक्षा आठवीं तक ही हो सकी लेकिन स्वाध्याय से उन्होंने हिन्दी,संस्कृत,उर्दू अंगरेजी आदि भाषाए सीखीं थी|ख़ास बात यह कि उनकी शिक्षा जीवन और किसानी की बारीकियों को समझने में संपन्न हुई| उन्होंने किसानों की दुनिया और उनके समाज को जानने समझने में ही अपना सारा जीवन समर्पित कर दिया| दूसरी ओर उन्होंने जीवन और प्रकृति के व्यवहार को जानने और परखने में भी कोई कसर नहीं छोडी| अपने समाज को पढ़ने लिखने और सभ्य बनाने की प्रेरणा वे लगातार अपनी कारयित्री और भावयित्री क्षमता से देते रहे|मंहगाई पर लिखी उनकी कविता का अंश देखिये-
हमका चूसि रही मंहगाई।
रुपया रोजु मजूरी पाई, प्रानी पाँच जियाई,
पाँच सेर का खरचु ठौर पर, सेर भरे माँ खाई।
सरकारी कंट्रोलित गल्ला हम ना ढूँढे पाई,
छा दुपहरी खराबु करी तब कहूँ किलो भर पाई।
हमका चूसि रही मंहगाई। 
सरकारी कंट्रोल से मिलने वाले अनाज से गरीब मजदूर और कम जोत वाले किसान का आज भी  पेट नहीं भरता|सत्तर के दशक में जब एक रुपया रोज की मजदूरी मिलती थी तब भी ऐसी ही दशा थी सरकारी खाद्यान्न वितरण नीतियों की आलोचना करते हुए शुक्ल जी बताते हैं कि सरकारी गल्ला कैसे गायब हो जाता है|गरीब को छ सात दिन लाइन लगाने के बाद भी पूरा अनाज नहीं मिला पाता|
गाँव में दलितों के जीवन में आज भी बहुत परिवर्तन नहीं हुआ है|पराधीन भारत में यह दशा और भी हृदयविदारक थी|अछूत समझे जाने वाले हमारे समाज के निम्न जातियों वाले मनुष्यों के साथ पशुओं से भी बदतर व्यवहार हमारे ही सवर्ण मानसिकता वाले आस पड़ोस के लोग कर रहे थे| ऐसी घृणा की मानसिकता का  चित्र शुक्ल जी ‘अछूत  की होली’ शीर्षक कविता में अभावग्रस्त दलित मन की व्यथा के साथ  रेखांकित करते है-
हमैं यह होरिउ झुरसावइ।
खेत बनिज ना गोरू गैया ना घर दूध न पूत।
मड़ई परी गाँव के बाहर, सब जन कहैं अछूत॥
द्वार कोई झँकइउ ना आवइ।
   शुक्ल जी किसान जीवन जीने के कारण किसानो के पक्षकार के रूप में अपनी स्वाभाविक भूमिका निभाते हुए आगे बढ़ाते हैं|यह साफ़ करते हुए चलते हैं कि किसान की रोटी छीनकर खाने वाले हजारों ठग हैं|निम्न कविता में देखिये-
यक किसान की रोटी,जेहिमाँ परिगइ तुक्का बोटी
भैया!लागे हैं हजारउँ ठगहार।
हँइ सामराज्य स्वान से देखउ बैठे घींच दबाये हइँ
पूँजीवाद बिलार पेट पर पंजा खूब जमाये हइँ।
गीध बने हइँ दुकन्दार सब डार ते घात लगाये हइँ
मारि झपट्टा मुफतखोर सब चौगिरदा घतियाये हइँ।
तात्पर्य यह कि कठिन परिश्रम से कमाई गयी किसान की एक रोटी पर भी साम्राज्यवादी कुत्ते गरदन झुकाकर नजर गडाए बैठे हैं|,पूंजीवादी बिल्लियाँ,गीध जैसे दुकानदार और मुफतखोर सब घात लगाए बैठे हैं|आज देश की स्वतंत्रता के सात दशकों के बाद भी हमारे समाज में किसानों की दशा लगभग उनके समय जैसी ही है, कुछ तकनीकी औजारों और वैज्ञानिक विकास की किंचित प्रगति के अतिरिक्त कोई ख़ास परिवर्तन किसान की दुनिया में नहीं हुआ है|वह आज भी भूखा है,कर्जदार है और आत्महत्या के लिए विवश है|शहरीकरण तो उलटे सीधे ढंग से बढ़ा है किन्तु गाँवों का सर्वनाश हुआ है| सत्तर के दशक में लिखी अपनी कविता के माध्यम से शुक्ल जी पूछते है-
रोय रहे सब भारतवासी,हाय देसा का को विश्वासी
कृषक श्रमिक विद्यार्थी तड़पें बढ़ी लूट अफसर ऐयासी
नौकरसाही का थनु पकरे लटकि रही सरकार  
देस का को है जिम्मेदार |
चौराहे पर ठाढ किसनऊ ताकै चारिव वार||
 नौकरशाहों की नीतियों के समक्ष बौना महसूस करती हमारी सरकारें आज तक किसानों के साथ न्याय नहीं कर सकी हैं|कृषियोग्य भूमि का दुरुपयोग लगातार कस्बों और शहरों के निकट की जमीनों पर किया गया और लगातार जारी है|किसान को कभी अपनी उपज का वाजिब मूल्य सरकारों ने नहीं दिया| बैंकों के अलावा महाजनों के चंगुल में आज भी किसान फंसा हुआ है|आज जिस शहरीकरण की ओर लगातार हमारा समाज बढ़ा है उसके पतित जीवन मूल्यों और रहन सहन की बात शुक्ल जी ने वर्ष 1935 में लिखी ‘हुवां कस कस होई निरबाह ’शीर्षक कविता में बखूबी की है|कविता का अंतिम अंश देखिये-
जहां की दुनियइ छायाबाद,भेखु भाखा बखरी ब्यउहारु
पेट मा कपट बात मा दगा जीभ मा झूंठ ओठ मा प्यारु |
आँखि मा नसा चित्त मा छोभु ,देह मा रोग रूपु सुकुमार
दउसु भरी काटइ सबके प्याट ,यहै बइपारु लच्छ ब्यभिचार|
जहां पर कहइ  चोर का साह/ हुवां कस कस  होई निरबाह |
कहने को बहुत कुछ कहा जा सकता है,परन्तु अब तक कुछ चंद हिन्दी के लोगों ने ही उनकी रचनाशीलता को रेखांकित भी किया है|सबसे पहले मेरे गुरुवर प्रो.हरिकृष्ण अवस्थी जी ने लखनऊ विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में उनकी कविताओं को पाठ्य विषय के रूप में वर्षं 1977 में सम्मिलित किया |इस प्रकार बाद में अनेक विश्वविद्यालयों में उनकी कविताएँ पढाई जाने लगीं| लेकिन उनकी रचनाशीलता पर समग्र कार्य वर्ष2003 में डॉ.श्यामसुंदर मिश्र मधुप जी के संपादन में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान से प्रकाशित उनकी रचनावली के रूप में आया|इस सबके बावजूद विडम्बना देखिये की अवध से इतर प्रदेशों के रचनाकारों और हिन्दी के विद्वानों ने ऐसे महत्वपूर्ण कवि को लेकर कोई पाठचर्या की व्यवस्था नहीं बनाई| उन्हें केवल अवधी के रचनाकार के रूप में सीमित कर दिया गया|मधुप जी के शब्दों में वे अवधी रचनाशीलता के सम्राट हैं| आधुनिक अवधी रचनाकारों की त्रयी की बात करें तो उनमे तीन किसानवादी जनकवि मिलते हैं जिनमें सर्वश्री बलभद्रप्रसाद दीक्षित पढीस ,वंशीधर शुक्ल,और रमई काका का नाम उल्लेखनीय है|इन तीनों ने महाकाव्य या खंडकाव्य भले ही न लिखा हो किन्तु अवध के ग्राम्य जीवन के मार्मिक प्रसंगों को गहराई से व्याख्यायित किया है|यदि वंशीधर शुक्ल जी की अवधी सेवा की बात की जाए तो शुक्ल जी ने पढीस जी या रमई काका की अपेक्षा बहुत अधिक कार्य किया है| ये सब  अपने समाज के जनकवि हैं| शुक्ल जी अपने समाज के नेता भी बने और जब कांगेरस से निराश हुए तो राजनीति से संन्यास ले लिया|वंशीधर जी का स्वर अपनी कौम और सामाजिक दुनिया के लिए एकदम साफ़ है|वे निराला की तरह अकुतोभय रचनाकार हैं|  






रविवार, 4 फ़रवरी 2018

सपना बेंचि रहा सौदागर
फ़ीकी मीठी आयुर्वेदिक चाह बिकि रही चार साल ते
नवा पकौड़ा वाला बिजनेस दादा अबकी भवा उजागर |
आगे नाथ न पाछे पगहा वहिके पाछे कइयो गदहा
ऐसी कूदै वैसी चमकय बना फिरे सबका नटनागर |
सरबत पियै बतावै पानी सगरी झूठम झूठ किहानी
बेंचि रहा गंजेन का कंघी सबते खेलि रहा सौदागर |
यहै तरक्की यहै तरक्की आसमान पर फहरा नारा
नौजवान बेकार बैठ हैं मनई हुइगा मूरी गाजर |
(@ भारतेंदु मिश्र ,खुसबू की गठरी  )

शनिवार, 11 नवंबर 2017

चलौ खिचरी बनाई पिया
जी.एस.टी. चोट बुरी कस होटल जाई पिया
आंटा गील दाल का संकट कैसे जाय जिया
चलौ खिचरी बनाई पिया|
नई सदी की राजनीतिमा या रेसिपी अलबेली है
दाल चारि दाना विपच्छ जस चउरन की रंगरेली है
चुटकी भरि हरदी मा भगुआ रंगु चढ़ाय लिया|
येहि खिचरी ते किस्मत चमकी बाबा बाबू की
कौसल बाढी औरु नौकरी लागी राजू की
अर्थव्यवस्था के संकट का मोर्चा मार लिया|
लरिका बिटिया,बूढा बुढऊ सब मिलिकै खइहैं
जोगी- मोदी, मोदी -जोगी के सब गुन गइहैं
दुनिया के बैपारी आवै लगिहैं हुआँ हियाँ |
(@भारतेंदु मिश्र,खुसबू की गठरी )

बुधवार, 8 नवंबर 2017

                                                                 तिरलोचन ते पहिल भेंट

# भारतेंदु मिश्र

त्रिलोचन अपने गाँवमा पहेलवानी सीखेनि रहैं | देहीं दसा ते तो हट्टे कट्टे रहबै कीन असली तो तिरलोचन भासा के पहेलवान रहैं ,लरिकईं  म कबड्डी ख्यालति बेरिया वुइ अष्टाध्यायी के सूत्र दोहरावति रहैं  |तबहीं उनमा शास्त्री बनैके के सब लच्छन आय गे रहैं |बनारस म वुइ साहित्यिक गोष्ठिन के केंद्र बने रहे पैदर चलेम उनका कोई मुकाबला न रहै| जवानी के दिनन म वुइ साइकिल औ रिक्सौ चलावति रहैं | बहरहाल उनकी कबिताई बनारसै मा सबके गले क हार बनी| वुइ बहुती भासा सीखेनि रहै लेकिन कहति रहें - ‘तुलसीदास ते भासा सीखा है|’  ग़ालिब ते भासा कि रवानी, बाल्मीकि , कालिदास और भवभूति ते कबिताई की परंपरा सीखेनि रहै तो शेक्सपीयर ते सानेट सीखेनि | लेकिन मालुम होति है कि तुलसी उनके ख़ास वस्ताद रहैं ,येही कारन तिरलोचन तुलसीदास पर कइयो कबिता लिखिन है| अवधी म बरवै लिखति बेरिया तिरलोचन जी गोसाईं तुलसीदास क फिरि यादि करत हैं |अपने गाँव कि बोली भासा म कबिता लिखै वाला कबि सांचौ बलगर तो होई-
दाउद महमद तुलसी कइ हम दास
केहि  गिनती मंह गिनती जस बन घास|
त्रिलोचन खुद का मुल्ला दाउद,मलिक मोहम्मद जायसी औ तुलसी के दास बतावति हैं| माने उनकी बनाई अवधी वाली लीक पर तिरलोचन अमोला लिखेनि |अमोला के बरवै जेतने अनगढ़ औ सरल सहज है वतनै गंभीर औ किसान मंजूर परिवारन कि दसा बखानै वाले हैं| वुइ अपनी बोली भासा मा अपने गाँव जवारि के मनईन का सिक्षितौ करति चलति हैं|वुइ भूख देखिन रहै,अभाव झेलिन रहै लेकिन कब्बौ गलत राह नहीं चुनेनि ,काहेते सांचौ वुइ पहेलवान रहैं |उनकी पहेलवानी उनकी काठी ते झलकत रही|अभाव औ विपन्नता ते उनका पैदाइसी नाता रहै |वुइ सांचौ जंगली घास कि नाई प्राकतिक जिनगी जिए यह नैसर्गिक अरघान उनकी कबिताई कि असली रंगति आय|बरसन वुइ बड़ी केरि दाढी रखाए रहे|कहति रहैं- ‘ सरीर का खरपतवार आय -रोज रोज कि हजामत को करै केतना टाइम कि बचत है, खर्चा तो बचतै है| दाढी मूछ तो रिसि मुनियों की सान अहै |’ दाढी ते उनके चेहरे कि रौनक बनी रहै| चीन्ह वाले उनका जनतै रहैं, अनचीन्ह वाले मनई उनका साधू समझ लेति रहैं |राह मा देस परदेस सब लंग उनका बहुतै सनमान रहा| जादातर लरिकवा उनका बाबा कहतै रहैं| शिवांक उनका नाव ‘खरपत्तू बाबा ’ धरेसि रहै|

अवधिया रहैं तो हमका उनकी बातन मा बहुत रसु मिलत रहै|सन 1989 मा तिरलोचन शास्त्री ते पहिली दफा मुलाक़ात भय |  दिल्ली के सादतपुर मोहल्ले मा याक नागार्जुन नगर नाव कि बस्ती है|तब हुवनै   कानपुर के जनकवि शील जी के सम्मान मा समारोह आयोजित कीन गा रहै |तब हम भजनपुरा मा  रहन |वुइ समारोह म बाबा नागार्जुन ,त्रिलोचन शास्त्री,विष्णु चन्द्र शर्मा,डा.माहेश्वर,हरिपाल त्यागी,सुरेश सलिल ,रामकुमार कृषक,महेश दर्पण के अलावा दिल्ली के तमाम जनवादी,प्रगतिशील रचनाकार औ पढ़ैया लिखैया मिले| ई समारोह कि जानकारी हमका स्व.डा.बिंदुमाधव मिश्र जी ते मिली रहै| वहु  समारोह अपनी तन का अद्भुत समारोह रहा |सबते जादा आकर्षक तो ‘शील जी’ का कविता पाठ रहा | जहां तक हमका यादि है वुइ कइयो मार्क्सवादी विचारन कि कबितन के साथ यहु गीतौ सुनायेनि रहै| येहि गीत मा ख़ास बात है मनई के हार न माने कि प्रेरणा-

राह हारी मैं न हारा !
थक गए पथ धूल के उड़ते हुए रज-कण घनेरे ।
पर न अब तक मिट सके हैं,वायु में पदचिह्न मेरे ।
जो प्रकृति के जन्म ही से ले चुके गति का सहारा !राह हारी मैं न हारा !
‘राह हारी मैं न हारा’ –यह पंक्ति मन मा तब्बै ते बसि  गय है| यू समारोह कौनौ अकादमी वगैरह के कार्यक्रम जस न रहै|सब आपसी सहयोग ते व्यवस्था कीन गय रहै|
घर का बना भोजन ,गाँव जस वातावरण,मानो कोई पारिवारिक काम काज जस|ख़ास बात यह रहै कि  तब  पहली दफा  मिले तिरलोचन जी से निसंकोच बतियाये म हमका कौनिउ झिझक न भय वह उनते  पहिल मुलाक़ात रहै |बाबा नागार्जुन का  बस पैलगी कीन और उनते तब दूरि ही बैठेन ,काहेते सुना रहै कि वुइ बड़े गुस्सैल हैं |तब वुइ बीमारौ रहैं |तिरलोचन जी सहज अवधिया बुजुरुग की नाई बतुआत रहैं |कुछ दिन बाद पता चला कि तिरलोचन जी यमुनाविहारैम  रहति हैं| उनके सहपाठी पंडित गंगारतन पाणे  से हम  लखनऊ मा मिल चुके रहन | पाणे  जी बनारस के किस्सन मा अपने सहपाठी तिरलोचन जी का औ शंभुनाथ सिंह का जिकर बड़े चाव ते करत रहैं | येहीके मारे हम उनते  मिलैका मनु  बनावा  औ बस फिर उनका पता  खोजि  लीन |वुइ बहुतै निसंकोच ढंग ते मिलैक समय दीन्हेनि  उनकी छोटकी पतोहू ऊषा जी चाह पानी ते हमार स्वागत कीन्हेनि |तिरलोचन जी हमते हमरे बारे में पूछेनि  – हम  बतावा  कि हम संस्कृत म लखनऊ से एम्.ए. कीन  है, औ अब हियाँ याक सरकारी इस्कूल  म पढायिति है| औ दिल्ली विश्वविद्यालय ते ‘नाट्यशास्त्र में निरूपित विविध कलाए’ विषय  पर शोध करिति  है |हिन्दी म पढें लिखेक सौख है| आपके सहपाठी गंगारतन पाणे ते आपकि बड़ी तारीफ़ सुना है| वुइ बोले-‘ये शुभ लक्षण है क्योकि हिन्दी वालो को हिन्दी नहीं आती |’ ईके बाद घनी  देर तक वुइ पाणिनि ,कालिदास,बाणभट्ट पर चर्चा कीन्हेनि | हम चुपान बैठ रहेन वुइ संस्कृत का महत्त्व औ वहिकी सीमा वगैरह हमका बतावति रहे|येही बीच चाह आय गय रहै हम दुनहू जने चाय पियेन औ फिर बतकही आगे चली |अकबकाय के तिरलोचन जी पूछेनि  –‘आप श्रुतिधर हैं?’ मैंने कहा- ‘नहीं..मैं वेदपाठी नहीं हूँ ,मुझे वैदिक परंपरा आदि का भी विशेष ज्ञान नहीं है| बस थोड़ा काव्य और नाट्य साहित्य पढ़ा है|’ वुइ मुसक्यान औ अपने कुर्ते के खलीते से चुनौटी निकार के कहेनि - ‘देखो भाई, मैं ब्राह्मण तो नहीं हूँ लेकिन श्रुतिधर अवश्य हूँ|’ अब हम बिलकुल सहज हुइ गयेन रहै|हम कहा-‘ई परंपरा ते तो हमहूँ जुड़े हन |..हमार  दादा औ नाना सब  श्रुतिधर रहैं , सब चुनही का ही सेवन करते थे| लेकिन हम पनही लेइति  है |’ वुइ हँसे औ तमाखू के बारे म तमाम लोकविख्यात किस्सा  सुनावै लाग|हमहुक बतकही म मजा आवै लाग रहै|फिर बोले –‘पनही लेने -का एक और अर्थ भी है| ’ हम कहा ‘जी अभी तो पान वाली तम्बाकू से ही आशय है|’ वो बोले-‘हाँ पनही और पनही पूजन से बचिए|’
ईबिधि निर्विकार वातावरण म उनसे पहिल भेंट भय रहै| जैसे तमाम साहित्यकार नए लेखकन के सामने अपनी योग्यता क्यार भौकाल खडा करति  हैं ,वह बात उनमा न रहै|  ख़ास बात यह कि तिरलोचन जी अपनि  कबिता, अपनि किताब ,यानी अपने लेखन के बारे मा तब कोई बात नहीं कीन्हेनि | हमका कब्बौ न लाग कि हम इतने बड़े कबि के सामने बैठ हन,बादि  मा कइयो मुलाकातै भईं| तब हम यमुनाविहार के पास  भजनपुरा म रहित रहै| उनका घरु हमरे घर ते कोई आधे कि.मी. के फासले पर रहै| फिर का जब द्याखौ तब उनकी वार जाय लागेन | जब तक वुइ यमुनाविहार मा 
रहे अक्सर उनका असीस मिलत रहा| वुइ दिनन मा  आद्याप्रसाद उन्मत्त जी हुवनै रहैं |
संपर्क:
सी-45/वाई-4
दिलशाद गार्डन,दिल्ली-11 00 95
ईमेल-b.mishra59@gmail.com

फोन-98 68 03 13 84 

शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

धन्यवाद माधव भैया-
इस पुस्तक पर स्वतन्त्र रूप से की गयी यह पहली टिप्पणी है|पढीस जी युग चेता थे उन्होंने अवधी वालों जो दिशा दिखाई आधुनिका अवधी के तमाम कवि उनके पगाचिन्हों पर चलकर  आज भी अवधी की सेवा कर रहे हैं-(राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित )

रविवार, 3 सितंबर 2017

.त्रिलोचन शास्त्री से साक्षात्कार
‘अवधी गद्य में अनंत शक्ति है’ :त्रिलोचन शास्त्री
(यह साक्षात्कार ‘मानसी’ मासिक पत्रिका के लिए वर्ष 1992 में उनके यमुनाविहार स्थित आवास पर लिया गया था|उस समय जो टिप्पणी मैंने लगाई थी वही बाद में राष्ट्रीय सहारा और फिर वहां से ‘मेरे साक्षात्कार :त्रिलोचन ’में भी शामिल हुई |उसे ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया जा रहा है|विशेष बात यह कि इस छोटे से साक्षात्कार में मुझे लगभग उनके साथ 12 घंटे बैठना पडा था|मैं कलम से लिखता था ,तब मेरे पास टेपरिकार्डर भी नहीं था और त्रिलोचन जी बार बार बतकही में विषयांतर हो जाते थे|
सुख दुःख ,लाभ हानि,उपलब्धि-अनुपलब्धि की चर्चा से दूर निसंकोच गंभीर भाव से अकेले आदमी के भीतर के आदमी और उसके सरोकारों को जान समझ कर अपनी रचनाओं में एक अवधी चरित्र त्रिलोचन जी ने अपने पात्रों के माध्यम से विक्सित किया है|वे अवध के गाँवों को विश्वविद्यालय मानते हैं|त्रिलोचन से पूर्व निराला की कविताओं में भी इस अवधी चरित्र का संदर्श प्राप्त होता है|अब सर्वहारा की बात शुद्ध खडी बोली या अंगरेजी में दूरारूढ़ कल्पनाओं में सोफों पर बैठकर भी की जा रही है ,पर त्रिलोचन जी पात्र के निकट जाकर उसके भाषाई चरित्र में ही बात करते हैं |शास्त्री जी के पास यद्यपि संस्कृत,अंगरेजी,उर्दू,बांग्ला,मराठी,गुजराती आदि अनेक भाषाओं के टकसाली शब्द हैं किन्तु विद्वत्ता झाडना उन्होंने ध्येय ही नहीं बनाया|घनी दाढी मूछों वाले त्रिलोचन के व्यक्तित्व में गंभीरता दूर से ही झलकती है,पर बातों की सहजता और भी आकर्षित कर लेती है| त्रिलोचन शास्त्री ‘लोचन अनत उघाडिया ,अनत दिखावनहार’ कबीर की इस उक्ति के पर्याय लगते हैं| ---# भारतेंदु मिश्र )

प्रश्न-आपका वास्तविक नाम वासुदेव सिंह है,फिर त्रिलोचन नाम का वर्ण आपने कब किया,उसका उद्देश्य क्या था?
त्रिलोचन :-बचपन में ही मेरे पिता का देहांत हो चुका था -6 या 7 की आयु में |यह नाम मेरे संस्कृत के गुरु ने दिया था|मैं उनके घर पढ़ने जाता था|मेरे पिता ने जिन्हें लोग बैरागी भी कहते थे ,ईशावास्योपनिषद तथा कठोपनिषद याद कराया था|मेरी स्मरण शक्ति शुरू से ही ऐसी रही है कि जो कुछ एक बार बताया गया या ध्यान से सुना उसे ज्यों का त्यों याद कर लिया| एक बार मैं गाँव के मित्रों के साथ कबड्डी खेल रहा था तो बजाय कबड्डी –कबड्डी कहने के मैं उपनिषद् मन्त्रों को ही बोला रहा था|संयोगवश वहीं पास में पंडित जी बैठे थे|उन्होंने जब यह देखा तो मुझसे मेरा परिचय पूछा,और मेरे साथ मेरे घर गए|फिर मेरी दादी से कहा , ‘मैं इस बालक को संस्कृत पढ़ाना चाहता हूँ|’ दादी ने थोड़ा तर्क वितर्क करने के बाद मुझे अनुमति दे दी|मैं दोपहर डो बजे तक मदरसे में उर्दू पढ़ता फिर वहां से दो मील दूर पंडित जी के घर संस्कृत पढ़ने जाने लगा|पहले दिन पंडित जी ने माहेश्वर सूत्र लिखवाये |फिर एक एक सूत्र पढ़कर उनका उच्चारण बताया| और याद करने के लिए कह कर खेत पर चले गए|मैं कुछ डेरा बाद अन्य छात्रो के साथ कबड्डी खेलने लगा|इतने में पंडित जी खेत से वापस आ गए,और क्रोधित होकर मुझसे पूछा -‘सूत्र याद हो गए?’मैंने कहा-‘सुन लीजिए |’ उनके संकेत पर मैंने चौदहों सूत्र सुना दिए|फिर अन्य छात्रों को दंड देते हुए तीन बार मुझसे पंडित जी ने सूत्र सुने |तीन बार यथाक्रम सुना देने पर उन्होंने पूछा-‘पहले से याद था ?’ मैंने कहा ‘नहीं’ तो मुझे गोद में उठा लिया| और प्रसन्न होकर मुझे
त्रिलोचन नाम मेरे संस्कृत के गुरू ने दिया|

प्रश्न-वर्तमान हिन्दी कविता पर महानगरीय बोध या कोरी आंचलिकता का प्रभाव है,परन्तु आपकी कवितायें अवधी चरित्र से अधिक जुडी हैं|इसका मूल कारण क्या है?
त्रिलोचन:- नगर में रहने वालों का व्यावहारिक ज्ञान स्तर कम होता है,क्योंकि गाँव वालों का व्यावहारिक प्रत्यक्षीकरण करने का उन्हें सुयोग ही नहीं मिलता|मिलना जुलना भी बहुत कम होता है|महानगरीय जीवन में फूल-पौधे वन आदि दुर्लभ होते हैं |यह सब गांवों में सुलभ होते हैं| गाँव का बालक किताब पढ़ने में भले ही कमजोर हो,वनस्पति ज्ञान में नगर के बालक से आज भी असाधारण है|वनस्पति,पशु और मनुष्य के नाना रूपों में चेतना के विकास के साथ साथ जिसकी चेतना का विकास होता है,रचनाकार होने निकट पर वह जीवों के पारस्परिक संबंधों को भी अच्छी तरह रख सकता है|हमारे प्राचीनतम महाकवि न नगर निंदक थे न ग्राम निंदा और न अरण्य जीवन के ,इसीकारण वे पूर्ण कवि थे|जीव और जीवन के निकट होने पर ही कोई कवि हो सकता है|मेरी चेतना का विकास या निर्माण अवध के परिवेश में हुआ |यदि अवध को कोई पाठक मेरी रचना से पहचानता है तो मेरा रचना कार्य सफल ही कहा जाना चाहिए|

प्रश्न:-‘भौजी’,’उस जनपद का कवि हूँ’, ‘झाँपस’, ‘नगई महारा’, ‘चैती’ में कातिक का पयान जैसी कवितायें आपकी मौलिकता को रेखांकित करती हैं आपको इन चरित्रों ने किस प्रकार प्रभावित किया ?
त्रिलोचन:- मेरी रचनाओं में जो व्यक्ति आये हैं वे इसी भूतल पर मुझे मिले |उनमें से आज कुछ हैं कुछ नहीं|लोग चाहें तो कह सकते हैं|कि मेरी अनुभूतियाँ अवध को नहीं लांघ पातीं,लेकिन मैं भारत वर्ष में जहां कहीं गया हूँ वहां के भाव भी वहां के जीवन के साथ ही मेरी कविताओं में आये हैं|मेरे यहाँ अवध के शब्द मिलते हैं लेकिन अन्य राज्यों के अनिवार्य शब्दों का अभाव नहीं है|मैं आज भी गाँव की नीची जाति के लोगों के साथ बैठकर बात करता हूँ|अवध के गाँवों को तो मैं विश्वविद्यालय मानता हूँ| ‘नगई महारा ’से बहुत कुछ मैंने सीखा|वह कहार था –गांजा पीता था ,पर उसे बहुत से कवियों के कवित्त याद थे| ‘साईं दाता संप्रदाय’ तथा बानादास की कवितायें भी उससे सुनी थीं|उसी के कहने से मैं साईं दाता संप्रदाय को जान पाया |नगई उस संप्रदाय से भी जुड़ा था|उसपर अभी एक खंड और है जो लिखना है|अवध में गाँव के निरक्षर में भी सैकड़ों पढ़े लिखे से अधिक मानवता है|गाँवों में शत्रुता या मित्रता का निर्वाह है|यहाँ महानगर में ऊपर मंजिल वाले नीचे मंजिल वाले को नहीं जानते|

प्रश्न :- वंशीधर शुक्ल,गुरुभक्त सिंह मृगेश,पढीस,रमई काका,चतुर्भुज शर्मा,विश्वनाथ पाठक ,दिवाकर आदि के बाद अवधी लेखन में किस प्रकार के परिवर्तन की आवश्यकता है ?
त्रिलोचन:- अवधी में पढीस ,रमई काका,वंशीधर शुक्ल ,चतुर्भुज शर्मा,विश्वनाथ पाठक आदि उस कोटि के आदरणीय कवि हैं जैसे छायावाद के हैं|निराला ने प्रभावती उपन्यास में तीन पद अवधी में लिखे हैं ,एक भोजपुरी पद भी ‘सांध्य काकली’ में लिखा है|मानसिकता का अंतर मिलता है|गाँव में पुस्तकालय हो तो गाँव साक्षर हो|मानसिकता शिक्षा और उनके व्यवहार आदि में विकास हो|मैं समझता हूँ कि चेतना के कुछ ऋण होते हैं उन्हें उतारना चाहिए|मैंने अपने गाँव के केवटों को अवधी कवितायें सुनाईं ,उन कविताओं को सुनकर एक संत वृत्ति के बूढ़े केवट ने कहा –‘यह सब तो क्षणिक है |’ दूसरी बार वहां के चरित्रों को लिखा तो उसने पसंद किया| जिसे आज लिखा जा रहा है उसे समझाने वाले लोग भी होने चाहिए|गाँव में सदाचार को प्रतिष्ठित करने का काम अवधी से किया जा सकता है|यदि रीतिकालीन कविता पर भक्तों और संतों का प्रभाव न जमा होता तो गाँवों में अशालीनता बढ़ गयी होती|अत:सदाचार की प्रतिष्ठा संत कवियों ने ही की|अवधी में इस प्रकार का कार्य अब भी किया जा सकता है|

प्रश्न:- अवधी की बोलियों में एक रूपता कैसे बनायी जा सकती है? आपकी दृष्टि में बिरवा की क्या भूमिका हो सकती है?
त्रिलोचन:- मेरा कहना है जो जिस अंचल का है उसी रूप में उसका लेखन हो|यदि मैं सीखकर लिखूं तो सीतापुर की बोली में भी लिखूंगा पर जो वहां कवि है वह अधिक श्रेष्ठ लिखेगा |अत: मेरी दृष्टि में इन्हें एक रूपता देने की आवश्यकता नहीं है|वंशीधर जी ने अवधी में गद्य लिखा है वह मिले तो उसे ‘बिरवा’में प्रकाशित करना चाहिए|भाषा सपाट नहीं होती रचनाकार की दृष्टि सपाट होती है|अत: कहीं की बोली को स्टैण्डर्ड मानने के बाद वहां की संस्कृति भी स्टैण्डर्ड हो जायेगी|इस लिए किसी भी क्षेत्र को स्टैण्डर्ड मत बनाइये |संक्रमण क्षेत्रों की भाषा को भी मानिए |उसका मानकीकरण हो तब कोश बने|अवधी के गद्य में अनंत शक्ति है,वह शक्ति हिन्दी खडी बोली में ही नहीं है |उसमें विभक्तियाँ हैं|बिरवा यदि मानक कोश का स्वरूप तय करना चाहे तो उसके लिए मैं टीम को प्रशिक्षण दे सकता हूँ|

प्रश्न:- गद्य वद्य कुछ लिखा करो,शीर्षक कविता किसी समीक्षक की आलोचना से संदर्भित है,या आप समीक्षा में बदलाव महसूस करते हैं?
त्रिलोचन:- एक बार डा.रामविलास शर्मा ने पत्र लिखा|वे मेरे अध्ययन आदि की प्रशंसा करते हैं|उन्होंने मुझे गद्य लिखने का सुझाव दिया था|तभी लिखी थी यहाँ कविता-रुख देखकर समीक्षा का अब मैं हूँ हामी/कोई लिखा करे कुछ ,जल्दी होगा नामी |’ आधुनिक हिन्दी में आविष्कृत अवध का ज्ञान चाहिए और प्राचीन का आकलन |आलोचना श्रमसाध्य है |उसको चाहिए ,प्रहार करे या अनुद्घटित पर कुछ कहे ,नहीं तो उसका क्या महत्व है? जैसे-रामचंद्र शुक्ल ,नामवर आदि के आलोचक भी उनको पढ़ते हैं|आलोचक साधार पूर्व का और नए का विरोध करता है|प्रशंसा मूलक आलोचना में भी अभिज्ञान होता है पर देर में| धारदार आलोचना आलोचक को जल्दी यश दिलाती है|

प्रश्न:- आपको ‘शब्द’ पर हिन्दी संस्थान उत्तर प्रदेश द्वारा पुरस्कार भी मिला है|आप सानेट को किस रूप में परिभाषित करते हैं?आपके अतिरिक्त अन्य प्रमुख सानेट लिखने वाले कौन से लोग हैं?
त्रिलोचन:- मराठी में इसे सुनीत कहते हैं| सुनृत वाणी का विशेषण है|वह हिन्दी हो गया है| पहले बांग्ला में चतुर्दशपदी प्रयुक्त हुआ है|हिन्दी में 1909 में पहला सानेट प्रसाद जी ने लिखा तब वे 20 वर्ष के थे|सानेट उनके एक छंद में नहीं अनेक छंदों में हैं| 1929 में छपे ‘काशी उत्सव’ स्मारक संग्रह में एक कविता प्रसाद जी की है जिसमें तीन बंद रोला और अंत में उल्लाला है|लोचन प्रसाद पाण्डेय ने भी सानेट लिखे हैं|1901 में कच्छ के एक कवी ने उर्दू में सानेट लिखा| 1921 के बाद तो हिन्दी में कई लोगों ने सानेट लिखे हैं|निराला,पन्त आदि ने भी सानेट लिखे हैं|बच्चन ने रूसी से हिन्दी में अनुवाद करते समय सानेट का प्रयोग किया| नरेंद्र शर्मा ने भी कुछ सानेट लिखे हैं|निराला के प्रति पन्त का एक सानेट है-
‘छंद बंद ध्रुव तोड़,फोड़ कर पर्वतकारा
अचल रूढ़ियों की ,कवि ,तेरी कविता धारा
मुक्त अबाध ,अमंद ,रजत निर्झर-सी निसृत –
गलित ललित,आलोक-राशि ,चिर अकलुष,अविजित|’
निराला ने 16,पन्त ने ७० के आसपास तक सानेट लिखे हैं|बालकृष्ण राव ने 13 पंक्तियों के सानेट लिखे हैं|गुलाब खंडेलवाल की दो तीन पुस्तकें सानेट की छप चुकी हैं| डा.किशोरीलाल गुप्त की भी पुस्तक आ चुकी है| बिहार के रामबहादुर सिंह मुक्त की भी सानेट की पुस्तकें आयी हैं|सूर्यप्रताप सिंह ने बीस पच्चीस अच्छे सानेट लिखे हैं|केदारनाथ सिंह ने पन्द्रह सोलह सानेट तो लिखे ही हैं|सियाराम शरण ने सानेट लिखे हैं|प्रभाकर माचवे,शमशेर,डा.रामविलास शर्मा,नामवर आदि ने भी सानेट लिखे हैं|

प्रश्न:- सन 1956 की ‘निकष’ में गधे पर आपका एक सानेट पढ़ा –‘बंधु प्रशंसा की है मैंने सदा गधे की /कितना सहनशील होता है ,लाज नधे की-...मानव की संतति में केवल बची धृष्टता /उत्कृष्टता गयी,आयी है अब निकृष्टता |’ इस सानेट ने ही मुझे आपके करीब आने को प्रेरित किया| डा.शंभुनाथ सिंह ने नवगीत आन्दोलन शुरू किया था आपके सानेट तथ्य और कथ्य की दृष्टि से नवगीत भी लगते हैं|आपकी दृष्टि में इस आन्दोलन की सार्थकता क्या है?
त्रिलोचन:- नवगीतकार दूसरे बिम्ब का जो अंश लेते हैं वह पंक्ति के अंत में पूरा होता है ,अधूरा हुआ तो आंशिक सफलता होती है|गीतों में वाक्य लंबे भी हो सकते हैं|लेकिन इसका प्रयोग हिन्दी में कम मिलता है|अंगरेजी या उर्दू में है|निराला के ‘स्नेह निर्झर बहा गया है ’ जैसा एक वाक्य में लिखा गया गीत किसी दूसरे का नहीं मिलता|मैंने भी फ्रीवर्स में नवीन गति और लय का प्रयोग किया है-
‘जब जिस क्षण मैं हारा हारा हारा/मैंने तुम्हे पुकारा|’ बोध और लय से गीत बनेगा-फ्रीवर्स में भी हो सकता है| ‘शारंगधरसंहिता’(चौदहवीं शताब्दी ) वचनिका नाम से फ्रीवर्स पर विचार किया गया है| फ्रीवर्स की प्रेरणा मुझे उपनिषद् और मज्झिमनिकाय से मिली|मेरी इन कविताओं में भी लय बोध है-
‘प्रभु उन्हें दंड दो /जो लोग चलते नहीं है /और कहते हैं चलता हूँ/वे तुम्हारी शक्ति का अपमान किया करते हैं|’
नवगीत में अनाहत भाषा आनी चाहिए|तभी छंद सधता है|स्पीच रिदम होनी चाहिए-अज्ञेय,निराला,तुलसी में है|नवगीत आन्दोलन में ठहराव आ गया है|स्पीच रिदम को नवगीत वाले महादेवी के ‘पंथ रहने दो अकेला ’ शीर्षक गीत से समझें|निराश होने की बात नहीं है, हो सकता है कोई आगे आये|

प्रश्न:- राजनीति की गुंजाइश कविता में किस स्तर तक उचित है? क्या कविता और रिपोर्टिंग किसी सीमा पर एक जैसे नहीं लगते?
त्रिलोचन:- अनुभूतियाँ यदि प्राणमयी हैं और राजनीति करते हैं तो कविता पर उसका प्रभाव अच्छा है|संकल्पना काव्य को पुष्ट करती है|कवि दार्शनिक से ऊंचा होता है|राजेश जोशी की ‘मिट्टी का चेहरा ’ भोपाल -1984 -85 में लिखी गयी कविता है जिसमें मरे हुए पशुओं तक की चर्चा है|उसमें त्रास तो है पर गैस त्रासदी की रिपोर्टिंग नहीं है|अत: यह प्रभावित करती है|कविता में गहरी राजनीतिक समझ तो होनी ही चाहिए|