बुधवार, 25 जून 2014

 रमईकाका की जन्मशती:

  बौछार की भूमिका में डां. रामविलास शर्मा ने  लिखा था-उनकी गंभीर रचनाओं में एक विद्रोही किसान का उदात्त स्वर है,जो समाज में अपने महत्त्वपूर्ण स्थान को पहचान रहा है और अधिकार पाने के लिए कटिबद्ध हो गया है।
धरती हमारि –इसी कोटि की रचना है।
 धरती हमारि
धरती हमारि धरती हमारि
हैं चरती परती गउवन कै /औ ख्यातन कै धरती हमारि।
धरती हमारि धरती हमारि।
हम अपनी छाती के बल ते धरती मा फारु चलाइति है।
माटी के नान्हे कन कन मा,हमहीं सोना उपजाइति है॥
अपने सोनरखे पसीना ते ,रयातौ मा ख्यात बनावा हम।
मुरदा मानौ जिन्दा हुइगौ,जहं लोखर अपन छुवावा हम ॥
कंकरीली उसर बंजर परती,धरती भुडगरि नीबरि जरजरि।
बसि हमरे पौरुख के बल ते ,होइगै हरियरि दनगरि बलगरि॥
हम तरक सहित ब्वावा सिरजा,सो धरती है हमका पियारि॥
धरती हमारि धरती हमारि॥
हमरे तरवन की खाल घिसी,औ रकतु पसीना एकु कीन।
धरती मैया की सेवा मा,हम तपसिन का अस भेसु कीन॥
है सहित ताप के बडे घात,परचंड लूक कटकट सरदी।
रवांवन-रवांवन मा रमिति रोजु,चनदनु असि धरती कै गरदी॥
ई धरती का जोते जोते,केतने बैलन के खुर घिसिगे।
निखवखि फरुहा फारा खुरपी,ई माटी मा हैं घुलि मिलिगे॥
अपने चरनन की धूरि जहां,बाबा दादा धरैगे संभारि॥
धरती हमारि धरती हमारि॥
हम हन धरती के बरदानी,जहं मूठी भरि छांडति बेसार।
भरि जाति कोख मा धरती के,अनगिनत परानिन के अहार॥
ई हमरी मूठी के दाना,ढ्यालन की छाती फारि फारि ।
है कचकचाय कै निकरि परति,लहि पौरुखु बल फुरती हमारि॥
हम अनडिगे पैसरम के,हैं साच्छी सूरज औ अकास।
परचंड अगिनि जी बरसाएनि,हम पर दुपहरि मा जेठ मास॥
ई हैं रनख्यात जिन्दगी के,जिनमा जीतेन हम हारि हारि॥
धरती हमारि धरती हमारि॥
प्रस्तुति:भारतेन्दु मिश्र


रविवार, 15 जून 2014



रमई काका ग्रामीड जीवन की विसंगति के चतुर चितेरे हैं उनकी कबिता देखिए
-छीछाल्यादरि-




लरिकउनू बी ए पास किहिनि, पुतहू का बैरू ककहरा ते।
वह करिया अच्छरू भैंसि कहं, यह छीछाल्यादरि द्याखौ तो।

दिनु राति बिलइती बोली मां, उइ गिटपिट गिटपिट बोलि रहे।
बहुरेवा सुनि सुनि सिटपिटाति, यह छीछाल्यादरि द्याखौ तो।

लरिकऊ कहेनि वाटर दइदे, बहुरेवा पाथर लइ आई।
यतने मा मचिगा भगमच्छरू, यह छीछाल्यादरि द्याखौ तो।

उन अंगरेजी मां फूल कहा, वह गरगु होइगे फूलि फूलि।
उन डेमफूल कह डांटि लीनि, यह छीछाल्यादरि द्याखौ तो।

बनिगा भोजन तब थरिया ता, उन लाय धरे छूरी कांटा।
डरि भागि बहुरिया चउका ते, यह छीछाल्यादरि द्याखौ तो।

लरिकऊ चले असनान करै, तब साबुन का उन सोप कहा।
बहुरेवा लइकै सूप चली, यह छीछाल्यादरि द्याखौ तो। 

प्रस्तुति:भारतेन्दु मिश्र 

रविवार, 4 मई 2014



जन्मशती  वर्ष पर पावन स्मरण।

चन्द्रभूषण त्रिवेदी उर्फ रमई काका की दो कविताएं-
काका केरि बहुचर्चित कबिता
1.- ध्वाखा-
हम गयन याक दिन लखनउवै, कक्कू संजोगु अइस परिगा
पहिलेहे पहिल हम सहरु दीख, सो कहूँ - कहूँ ध्वाखा होइगा|

जब गएँ नुमाइस द्याखै हम, जंह कक्कू भारी रहै भीर
दुई तोला चारि रुपइया कै, हम बेसहा सोने कै जंजीर
लखि भईं घरैतिन गलगल बहु, मुल चारि दिनन मा रंग बदला
उन कहा कि पीतरि लै आयौ, हम कहा बड़ा ध्वाखा होइगा|

म्वाछन का कीन्हें सफाचट्ट, मुंह पौडर औ सिर केस बड़े
तहमद पहिरे कम्बल ओढ़े, बाबू जी याकै रहैं खड़े
हम कहा मेम साहेब सलाम, उई बोले चुप बे डैमफूल
'मैं मेम नहीं हूँ साहेब हूँ ', हम कहा फिरिउ ध्वाखा होइगा|

हम गयन अमीनाबादै जब, कुछ कपड़ा लेय बजाजा मा
माटी कै सुघर मेहरिया असि, जहं खड़ी रहै दरवाजा मा
समझा दुकान कै यह मलकिन सो भाव ताव पूछै लागेन
याकै बोले यह मूरति है, हम कहा बड़ा ध्वाखा होइगा ।

धँसि गयन दुकानैं दीख जहाँ, मेहरेऊ याकै रहैं खड़ी
मुंहु पौडर पोते उजर - उजर, औ पहिरे सारी सुघर बड़ी
हम जाना मूरति माटी कै, सो सारी पर जब हाथ धरा
उइ झझकि भकुरि खउख्वाय उठीं, हम कहा फिरिव ध्वाखा होइगा।



2.दानी किसान (काका की किसान चेतना इस कविता में देखने योग्य है--)

धन्नि धन्नि किसान दानी। 
लखि उदार तुम्हार हिरदय/पिघलि कै धावति हिमालय
बहि नदिन मा गुनगुनत है/सूख ख्यातन देत पानी।
धन्नि धन्नि किसान दानी।।
रीझि कै तुम्हरी दया पर/सुरज नावत सोन झर झर/
बनत बलगर खेत जर जर /मिलति सकती सब हेरानी।
धन्नि धन्नि किसान दानी।।
देखि त्यागु तुम्हार खेतिहर/सकल ख्यातन घेरि बादर
करत निज जीवन निछावर/मोह कोहकत दीठि बानी।
धन्नि धन्नि किसान दानी।।
तपनि भुलि- भुलि सौत –सिहरनि/चंडलूक बयारि हउकनि
सहेउ उधरेउ बदन तब ही /अन्न की रासी देखानी।
धन्नि धन्नि किसान दानी।।
लै गये परजा पवन कुछु /प्वात मा हुइगा गवन कुछु
सेस मा बेउहर बखारिन/तुम रहेव भूखे परानी।
धन्नि धन्नि किसान दानी।।
जगु जियत तुम्हरे निहोरे/पगु परत तुम्हरे निहोरे
नष्ट रचना होति बिधि कै/जो न होतेव अन्नदानी।
धन्नि धन्नि किसान दानी।।

मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

डां.भारतेन्दु मिश्र से उनके अवधी लेखन पर बातचीत

डां.रश्मिशील

प्र.1.रश्मिशील:-आप अवधी के रचनाकार है । आजकल नेट का जमाना है ,तो क्या अवधी साहित्य भी नेट पर उपलब्ध है ?
उ.1.भारतेन्दु मिश्र:-  रश्मिशील जी,आपने  सच कहा कि आजकल नेट  का जमाना है ऐसे तकनीकी समय  में अवधी जैसी लोक भाषा को भी नेट पर होना चाहिए। तो इस बात को मैं इस रूप में देखता हूं कि अंग्रेजी से इतर अनेक भाषाएं नेट पर आ गयी हैं ,कुछ भाषाओं  के पास अधिक  समर्थ कवि लेखक पत्रकार हैं जो साधन संपन्न होने के कारण तकनीकि संपन्न भी हैं और नेट पर अच्छा काम कर रहे हैं। अवधी का लोक जीवन और अवधी का रचनाकार उतना समर्थ  नही हैं।यह अवध के  हुक्मरानों द्वारा सदियों से शोषित आम जन की भाषा है।यह किसानों मजदूरों की अभिव्यक्ति का साधन है । यहां वैसा साधन संपन्न  भद्र लोक नही है।अवधी के कवि और लेखक भी वैसे संपन्न वर्ग से नहीं आते है। ..तो अवधी बहुत कम ही नेट पर दिखाई देती है। लेकिन 2009 से भाई डां.अमरेन्द्र त्रिपाठी का ब्लाग –अवधी कै अरघान –और ,अवधी,और बतकही ब्लाग को देख रहा हूं। कुछ और भी  मित्र काम कर रहे है।..मैने भी 2009 से ही -चिरैया अवधी प्रसंग नेट पत्रिका-ब्लाग शुरू किया था। कुछ और भी मित्र हैं-फेसबुक पर भी कई मित्र हैं जो अवधी मे कुछ थोडी बहुत सामग्री डालते रहते है। लेकिन यह अभी न के बराबर ही है। कविता कोश वालों ने अमीर खुसरो से लेकर -पढीस,बंशीधर शुक्ल और हमारे युवा कवि अशोक अग्यानी तक की कुछ कविताओं की बानगी नेट पर डाली है।       
प्र.2. रश्मिशील :-इस प्रकार के साहित्य की आपकी दृष्टि मे क्या उपयोगिता हो सकती है ?.क्योकि नेट की पहुंच मे अवध के गांव वहां के किसान आदि तो नही आते ?
उ.2.भारतेन्दु मिश्र:- देखिए,मेरी दृष्टि में तो नेट पर उपलब्ध साहित्य की बहुत उपयोगिता है।आज दुनिया भर में अवधी भाषी परिवारों के लोग बिखरे हुए हैं उन्हे इस माध्यम से अवधी से जुडने का अवसर मिला है। अवधी के सर्वत्र सुलभ साहित्य के नाम पर रामचरित मानस ऐसी पुस्तक है जो सब जगह मिल जाती है। आरती चालीसा आदि जो धार्मिक साहित्य है वह भी अवधी को जीवित रखने में सहायक सिद्ध हुआ है। दूसरी बात किसानो और मजदूरों की है तो यह सही कि नेट के साहित्य की पहुंच उन तक अभी नही है। किंतु साक्षरता और तकनीकि के विकास के साथ ही नेट  के साहित्य की उपयोगिता बढ जाएगी। समय लगेगा लेकिन वास्तविक विकास तो उस दिन शुरू होगा जब हम किसान मजदूर की भाषा में उसके सुख दुख को पढ  सकेंगे और उसकी समस्याओं को उसकी जरूरतों के अनुसार निपटा सकेंगे।मेरी दोनो ही अवधी उपन्यासों में मेरे पात्र इसी तरह काम करते हैं।   
प्र.3. रश्मिशील :-आपके  दो अवधी  उपन्यास –नई रोसनी और चन्दावती प्रकाशित हुए हैं,उनकी चर्चा भी होती है ।लेकिन अवधी में गद्य लिखने की प्रेरणा आपको कहा से मिली ?
उ.3.भारतेन्दु मिश्र:-रश्मिशील जी ,इन दोनो उपन्यासों से भी पहले मेरी एक अवधी कविता की पुस्तक सन 2000 मे –कस परजवटि बिसारी- शीर्षक से प्रकाशित हुई थी। संयोगवश इसी पुस्तक में मेरे दस ललित निबन्ध भी संकलित हैं। इस पुस्तक की आधिकांश रचनाएं जाहिर है कि नवें दशक या उससे पहले की हैं।मेरी अवधी कविताएं प्रकाशित करने  का काम डां. सुशील सिद्धार्थ ने सबसे पहले किया   वे उनदिनों –बिरवा-शीर्षक पत्रिका निकालते थे।,उनका अपना प्रेस भी था। पहलीबार बिरवा के अंक 7 में मेरे कुछ अवधी गीत प्रकाशित हुए।तो अनेक मित्रो के पत्र मिले यह संभवत: 1989 या 1990 की बात होगी। तब फोन कम होते थे। इसी बीच मैं आदरणीय त्रिलोचन जी के संपर्क मे आया।वे यही यमुनाविहार मे रहते थे। तब यहीं आद्याप्रसाद उन्मत्त जी भी रहते थे।बहरहाल त्रिलोचन जी ने ही मुझे अवधी मे गद्य लिखने की प्रेरणा दी।मैंने इसी लिए पहली पुस्तक में ही दस निबन्ध संकलित किए।ये पहली पुस्तक आदरणीय त्रिलोचन जी को ही समर्पित भी थी। तो जब उन्हे यह पुस्तक भेट की  तब वे हरिद्वार मे रहते थे।पुस्तक देने मैं स्वयं नही जा पाया था बल्कि डाक  से भेजी थी। तो उनके कई फोन भी आए और पत्र भी मिले जो कहीं सुरक्षित रखे हैं।
प्र.4. रश्मिशील :-हिन्दी यानी मुख्यधारा की उपन्यास की तुलना मे अवधी उपन्यास मे क्या अंतर है ? आपने  हिन्दी मे भी लिखा है –कुलांगना-आपकी उपन्यास सन-2002 मे प्रकाशित हुई थी और बाद मे अवधी के दोनो उपन्यास क्रमश:-2009और 2011 में प्रकाशित हुए तो आपको अवधी का चुनाव क्यो करना पडा ?
उ.4.भारतेन्दु मिश्र:- रश्मिशील जी ,हिन्दी विश्वभाषा है उसके पास अंतर्राष्ट्रीय दृष्टि से संपन्न लेखक हैं।विश्वस्तरीय मंच हैं- मुद्दे और समस्याएं भी विश्वस्तरीय  है,लेकिन अवधी एक सीमित क्षेत्र की भाषा है किंतु उसे भी समझने वाले  लोग करोडो की संख्या में हैं। और ये भी  सच है कि अवधी भाषी समाज के मुद्दे और प्राथमिकताएं अलग हैं,उदाहरणार्थ अवध के किसानो की समस्या,ग्राम्य युवकों और युवतियों की समस्याएं इस क्षेत्र के विकास आदि की दशा और दिशा।अवध की महिलाएं और उनकी धर्मभीरु पुरुषवादी चेतना आदि विषय हो सकते हैं- तो मुझे लगता है कि अवध के समाज को प्रगतिशील सोच से जोडने का इससे बेहतर और क्या उपाय हो सकता है ?  बस मैं यह जानता हूं कि मेरी दोनो उपन्यासों को पाठकों का बहुत स्नेह मिला।..रचनाकार के नाते मुझे भी अपनी मेहनत को लेकर संतोष है।..बाकी तो समय बताएगा कुछ और लोग आएंगे, अवधी गद्य में आपकी कहानियां..सुरेशप्रकाश शुक्लकी उपन्यास,ज्ञानवती की कहानियां,   अखलाक अहमद की कहानियां,रामबहादुर मिश्र का निबन्ध संग्रह आदि ऐसी सामग्री अब उपलब्ध है या होती जा रही है जिसे लेकर हम कह सकते हैं कि ये अवधी में गद्य का युग शुरू हो चुका है। यद्यपि लक्ष्मणप्रसाद मित्र के अवधी नाटक और रमईकाका के रेडियो रूपक अवधी गद्य के रूप मे पहले  से ही उपल्ब्ध हैं लेकिन वह साहित्य हास्य व्यंग्य की शैली मे लिखा गया है।आधुनिक अवधी गद्य की वैचारिक चेतना आधुनिक समाज के अनुरूप होनी चाहिए। ..तो अवधी लिखना मेरे लिए अपनी माटी को अपने सिर पर उलीचने जैसा है जो यहां दिल्ली मे नही मिलती।
प्र.5. रश्मिशील :-स्त्रीविमर्श की कसौटी  पर आपके नारी पात्र कितने खरे उतरते हैं? क्या चन्दावती को प्रगतिशील नारी पात्र की कोटि में रखा जा सकता है ?
उ.5.भारतेन्दु मिश्र:- देखिए ,स्त्रीविमर्श की कसौटी के बारे में मुझे अधिक ज्ञान नही है। वो सब तो आप लोग ही बता सकते हैं।लेकिन जहां तक चन्दावती की बात है तो वह एक जुझारू और प्रगतिशील नारी के रूप में उपन्यास मे उपस्थित है।वो मर जाने के बाद भी गांव समाज की एक प्रगतिशील नारी चेतना के रूप मे चित्रित की गई है।नई रोसनी में सुरसतिया,फूलमती और चन्दावती में गेन्दा,रधिया,मीरा,फूलमती जैसे पात्र जो देवीदल बनाते दिखाई देते हैं वो सब मेरे जीवित सपनों के संघर्षशील पात्र हैं।..लेकिन ये काल्पनिक सपनों के पात्र नहीं हैं अब ये  अवध के गांवों में  कहीं न कहीं प्रकट भी होने लगे हैं।नारी की प्रगतिशीलता से ही किसी  समाज की प्रगतिशीलता  का वास्तविक आकलन होता है । स्त्री की प्रगतिशीलता की बात तो प्रगतिशील मंचों से कम ही उठाई जा रही है।
प्र.6. रश्मिशील :-इधर लेखन में खुलेपन की वकालत की जा रही है .यह खुलापन अपनी संस्कृति पर प्रहार  नही है क्या ?..यदि प्रहार नही है तो क्या ये समय की मांग है ?
 उ.6.भारतेन्दु मिश्र:- खुलापन आप किसे कहती हैं,अशालीन या अश्लील भाषा यदि प्रसंगवश कहीं आती है तो उसे यथार्थवादी दृष्टि ही समझना चाहिए। ...आपको मालूम है कि तकनीकि के इस विकसित युग में तमाम युवा अपने फोन मे कितनी अश्लील सामग्री लिए फिर रहे हैं ? तो ये तकनीकि के साथ आने वाले अपसंस्कृति नही रुक पा रही है। हमें चौकन्ना होकर अपने बच्चों को पोनोग्राफी के बाजार से बचाना है। कहानी उपन्यास में यदि कहीं गालियों का प्रयोग कथानक की आवश्यकता के हिसाब से हो गया है तो उससे संस्कृति को कोई खतरा मुझे नही लगता। बल्कि सांस्कृतिक रूढियों को तोडकर ही नई रोसनी फैलाई जा सकती है।..तो निश्चित रूप से जैसा आपने कहा ये समय की मांग है।    
प्र.7. रश्मिशील :-अभी पिछले दिनो आपकी दो किताबें आयी हैं –एक कहानी संग्रह –खिड्की वाली सीट और दूसरी छन्दोबद्ध कविता की आलोचना की-समकालीन छन्द प्रसंग,तो क्या आप दोनो हाथ से लिखते हैं ?
उ.7.भारतेन्दु मिश्र:-जी ,हां मैं पिछले सात वर्षों से दोनो हाथों से ही लिख रहा हूं ,यानी कम्प्यूटर पर टाइप कर रहा हूं ..तो आप कह सकती हैं कि मै सचमें दोनो हाथों से लिख रहा हूं।लेकिन ये बात नही कि सब कुछ फटाफट लिखता जा रहा हूं।ये दोनो किताबें पिछले दो दशकों से विलम्बित थीं जो अब 2013 में प्रकाशित हो पायीं।
प्र.8. रश्मिशील :-समकालीन कविता मे छन्द या छन्दोबद्ध कविता  की क्या प्रासंगिकता है?
 उ.8.भारतेन्दु मिश्र:-जी, ये अंतिम प्रश्न है न ?
 रश्मिशील :- जी हां।

  भारतेन्दु मिश्र:- हां तो छ्न्दोबद्ध कविता की प्रासंगिकता की बात आप कर रही हैं।देखिए मैं तो लोक और अंचल से जुडकर देखता और सोचता हूं तो लगता है कि छन्दोबद्ध कविता ही दूर दूर तक दिखाई देती है। जो छ्न्दहीन कविता लिखते हैं और अकादमियों मे साल छह महीने में कभी एक बार अपनी कविता सुनाने के लिए बुलाए जाते हैं।उनका जनता से सीधा जुडाव बन नही पाता। उनके यहां किसान और मजदूर की भी बात अब नही होती। तो लोग क्यों पढेंगे छन्दहीन  नीरस कविताएं। भारतीय कविता की चेतना को यदि आगे ले जाना है तो छन्दोबद्ध कविता पर हमे बार बार बात करनी होगी।  कविता पाठ्य और श्रव्य दोनो रूपों में परखी जाती है। मैं कविसम्मेलनों के मस्खरों और भांडो का हिमायती बिल्कुल नही हूं।

प्रस्तुति:डां.रश्मिशील -3/8लेबर कालोनी -टिकैतराय तालाब ,लखनऊ-226004
फोन.9235858688

गुरुवार, 6 मार्च 2014




हरी जवानी

हम किसान हन
क्याला के बिरवा जैसी तकदीर
सारी दुनिया पूजै हमका
सत्यनरायन स्वामी के
हमहे मंडप हन
बेफै बेफै लोग हिंया आरती उतारै
पढ़ि पोथी फिरि हमका
सरधा ते अकत्यावें
लोटियन भरि भरि नीरु चढ़ावें
भजन सुनावें
आँखी मूंदि पंडितउनू तब संखु बजावैं
पोथिन मा अपनी इज्जति पर
झूमि-झूमि हरसाई
दिन दूने औ रात चौगुने
फूलि फूलि हरियाई
फूल चढ़ा तौ बतिया आयीं
तिनुक पोढाई
अब तौ फल पर
ललुआ बुधुआ सबही की नजरें ललचाईं
पाहिले गहरि काटि लैगे
फिरि जड़ ते काटेनि
हिलि मिलि कै पूजा का फल
अपनेंन मा बाटेनि
की ते रोई -कौनु सुनी
हमारी यह बिथा किहानी
लूटि चुके हैं गांवै वाले हमारी फसलें
काटि रहे हैं जड़
अबहीं है हरी जवानी |




मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014


उनकी सुधि का प्रणाम :आधुनिक अवधी क्यार महाकवि

बंसीधर कै बात निराली

सबके दादा सबके भैया
अवधी जीवन क्यार गवैया
बंसीधर कै बात निराली|

उनकी कबिता माँ झलकति है
सब किसान की दुनिया
चमकि रहे हैं गाँव देस के
मोलहे बुधई – झुनिया
टिका न कौनौ उनके समुहे
तिकडमबाज बवाली |

राजा की कोठी माँ की बिधि
लगा खून का गारा
सगरी कथा बतायेनि दउआ
यूं किसानु कस हारा
नए बिचारन की कबिताई
जस भोरहे की लाली|

गाँव देस सब जानै उनका
मनई सबते नीक
अवधी क्यार निराला हैं ई
नई बनाएनि लीक
उनहेनि के जनमे ते हुइगै
माटी अमर मनेउरा वाली|

रविवार, 5 अगस्त 2012


अवधी उपन्यास की नई रोसनी- चंदावती


- रवीन्द्र कात्यायन

प.शिवराममिश्र शि.सा.सम्मान-2012 के अवसर पर चन्दावती का लोकार्पण बाएँ से श्रीमती भारती मिश्र,सम्मानित साहित्यकार डाँ उमाशंकर शितिकंठ,विभांशु दिव्याल,शिवमूर्ति. और भारतेन्दु मिश्र


चन्दावती पर बोलते हुए वरिष्ठ कथाकार-शिवमूर्ति जी
हिंदी साहित्य के विस्तार के साथ-साथ हिंदी की उपभाषाओं में भी आज नई-नई विधाओं में रचनाकर्म हो रहा है। अवधी, भोजपुरी, ब्रज, मैथिली आदि में लिखे हुए साहित्य की परंपरा बहुत पहले से है। लेकिन आज जिस तरह की रचनाएँ इन उपभाषाओं में लिखी जा रही हैं, उस तरह की पहले नहीं लिखी गईं। इसका नया उदाहरण है अवधी में लिखे जाने वाले उपन्यासों की परंपरा। अवधी में नए उपन्यासों की रचना अवधी में एक नया प्रस्थान बिंदु है। भारतेन्दु मिश्र के दो अवधी उपन्यासों– नई रोसनी और चंदावती के द्वारा अवधी में उपन्यास लेखन का नया दौर शुरू हुआ है। जिसके लिए डॉ. विद्याबिन्दु सिंह ने लिखा है- भाई भारतेन्दु मिश्र कै ई अवधी उपन्यास एक बड़े अभाव कै पूर्ति करै वाला है। वै ई उपन्यास लिखि कै एक लीक बनाइन हैं जौने से अवधी म लिखै वाले अवधीभासी प्रेरणा पाय सकथिन।  (भूमिका, चंदावती)


भारतेन्दु मिश्र का नया उपन्यास चंदावती समकालीन भारतीय ग्राम का यथार्थ रूप प्रस्तुत करता है। यह उनके पहले उपन्यास नई रोसनी का विस्तार ही है जिसमें एक नई कथा और नए वातावरण द्वारा आज के भारत का गाँव पुनः जीवंत हो जाता है। इस गाँव में सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक रूप में जो हो रहा है, उसका यथार्थ चित्रण चंदावती का प्रमुख उद्देश्य है जो पाठकों को तो आकर्षित करता ही है, इसके साथ उनके मन में कई प्रकार के असहज करने वाले प्रश्न भी खड़े करता है। लोक में रची-बसी संस्कृति का सूक्ष्म और मनोहारी वर्णन भी कथाकार की सफलता है। आज के बदलते गाँव की तस्वीर चंदावती उपन्यास में इस तरह प्रस्तुत की गई है कि वो हमारे सामने एक स्वप्न भी निर्मित करता है। स्वप्न परिवर्तन का, स्वप्न एक नई व्यवस्था का, स्वप्न जाति-व्यवस्था के प्राचीन भँवर में फंसे समाज को उससे मुक्त करने का और सबसे ज़रूरी स्वप्न स्त्री की मुक्ति का- वह भी ग्रामीण स्त्री की मुक्ति का। ग्रामीण-स्त्री, जो शायद कुलीन स्त्री-विमर्श के केन्द्र में नहीं है। बहरहाल...
चंदावती की कथा है एक बाल-विधवा लड़की चंदावती और गाँव के सभ्य, कुलीन और विधुर ब्राह्मण हनुमान शुक्ल की प्रेम कथा की, जिसकी परिणति विवाह में होती है। विवाह भी नए प्रकार का। ग्रामीण व्यवस्था में आज से तीस साल पहले इस तरह का विवाह एक क्रांतिकारी कदम था। गाँव के बाहर कुछ लोग नरसिंह भगवान के चबूतरा के सामने जाते हैं और सरपंच के सामने पंचायत होती है। फिर वहीं हनुमान शुक्ल और चंदावती तेलिन का विवाह होता है। न सिर्फ़ जाति के बंधन टूटने के स्तर पर बल्कि स्त्री और पुरुष की सोच में परिवर्तन के स्तर पर भी यह विवाह अनोखा था। यही नहीं समाज को जब पता चलता है, तो भी दोनों को कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। हाँ हनुमान के छोटे भाई छोटकऊ से उनका अलगाव घर में पहले ही हो चुका था, खेती को छोड़कर। और यह खेती ही चंदावती की हत्या और दौलतपुर गाँव में स्त्री जागरण का कारण बनती है।



हाशिए का विमर्श अवधी में इस तरह शायद पहली बार दिखाई दिया है। लोक गीतों और लोक संस्कृति में तो बहुत से चित्रण हुए हैं लेकिन आज के ज़माने का यह चित्रण अवधी में बिलकुल नया है। स्त्री कमज़ोर तो है लेकिन उसके साथ कदम से कदम मिलाकर चलने वाली गाँव की अन्य महिलाएँ भी खड़ी हो जाती हैं। उसे जब उसका देवर और भतीजा उसके पति हनुमान शुक्ल की मृत्यु के बाद घर से बाहर निकाल देते हैं तो वो रोती नहीं बल्कि अपने घर के बाहर अनशन पर बैठ जाती है। यह है आज की स्त्री की जागृति- अपने अधिकारों के लिए। चंदावती शुरू से ही ऐसी ही निडर रही है। जब उसके सामने हनुमान शुक्ल विवाह का प्रस्ताव भेजते हैं तो वो उन्हें अपने घर बुलाती है और उनसे पूछती है कि तुम्हारे घर में हमारी स्थिति क्या होगी? पत्नी की या रखैल की? हमारे बच्चों को ज़मीन ज़ायदाद में हिस्सा मिलेगा या नहीं? आदि-आदि प्रश्न। कहना न होगा कि इस तरह का साहस हमारे समाज की लड़कियों में आज भी नहीं मिलता है। यदि हमारी लड़कियाँ चंदावती की तरह साहस और विवेक से काम लें तो न सिर्फ़ उनके प्रति अपराध कम होंगे बल्कि उनके ख़िलाफ़ होने वाले अत्याचारों को भी विराम लगेगा।        



पुरुष व्यवस्था के षड़यंत्र इतने ख़तरनाक हैं कि ऐसी साहसी चंदावती भी पुरुष द्वारा छली गई। हनुमान शुक्ल ने उसे विवाह से पहले नहीं बताया कि वो पहलवानी करते हुए चोट लगने से नामर्द हो चुके हैं। जब उसे पता चलता है तो बहुत नाराज़ होती है लेकिन क्या कर सकती थी। जितनी कोशिश कर सकती थी, उसने की लेकिन कोई संतान न हुई। और तीस साल के लंबे वैवाहिक जीवन के बाद हनुमान की मृत्यु ने उसे नए भँवरजाल में फंसा दिया। तेरहीं की रात को ही उसके देवर ने उसे घर से बाहर निकल जाने को कहा और सुबह होते ही उसे बाँह पकड़कर घर से निकाल दिया कि अब तुम्हारा यहाँ कोई काम नहीं। चंदावती सोच रही है- सीता होय चहै मीरा यहि दुनिया मा हर औरत का परिच्छा देक परति है। जीका मंसवा न होय, तीकी कवनिउ इज्जति नहीं। औरत तौ अदमी कि छाँह मानी जाति है, आदमी ख़तम तौ औरत जीते जिउ आपुइ खतम हुइ जाति है। बेवा कि जिन्दगी मुजरिम कि जिन्दगी तना कटति है। द्याखौ अब हमरी किस्मति मा का लिखा है। (पृ. 20)



इस षड़यंत्र में गाँव का प्रधान ठाकुर रामफल भी शामिल है, जिसने उन दोनों की शादी कराई थी। चंदावती को उस दिन की याद आ गई जब कूटी पर पंद्रह बीस लोगों की पंचायत लग गई थी- फेरे लेने से पहले। अधिकतर लोगों का विरोध ही था। सबसे अधिक हनुमान के छोटे भाई छोटकऊ का। लेकिन जायदाद के बँटवारे को रोकने के लिए वो मान गया। फिर धर्म के ठेकेदार पंडितजी दक्षिणा बढ़ाकर मंत्र पढ़ने के लिए तैयार हो गए। प्रधान रामफल हनुमान से बहुत से काम निकालता था सो उसने उनके हिसाब से ही सबको तैयार करवा दिया। पंडित ने कहा- तुम सब जनै तैयार हौ तौ बिधि-बिधान हम करवाय द्याबै। हमका तौ मंतर पढ़ैक है, संखु बजावैक है, अपनि दच्छिना लेक है। यू बिहाव नई तना का है। यहिमा दच्छिना सवाई हुइ जाई जजमान। बिहाव होई तो चंदावती तेलिन ते सुकुलाइन हुइ जाई। काहे ते जाति तो मर्द कि होति है। भगवान किसन कि तौ साठि हजार रानी रहै, सबकी अलग-अलग जाति रहै। सबका वहै सनमान रहै। परधान दादा जाति तो करमन ते बनति है, बेदन मा यहै सबु लिखा है। (पृ. 36) और इसी दिन को याद करके चंदावती सोच रही है- क़ि औरत कि जिन्दगी वहिके मर्द के बिना साँचौ माटी है- मर्द चहै सार नपुंसक होय, चहै कुकरमी होय लेकिन होय जरूर। (पृ. 46)



लेकिन चंदावती हार नहीं मानती है और गाँव की ही अन्य विधवा कुंता फूफू के साथ वहीं धरने पर बैठ जाती है। उन दोनों का साथ देने को गाँव की अन्य स्त्रियाँ भी शामिल हो जाती हैं। चंदावती के भाई संकर की बेटियाँ मीरा, मीना और ममता भी इस जंग में शामिल हो जाती हैं। चंदावती स्त्रियों के इस गुट को देवी दल का नाम देती है। वे सब वहीं पर देवी गीत, भजन गाती हैं और बीच-बीच में नारा लगाती हैं- सिव परसाद होश में आओ, चंदावती से ना टकराओ। यह जागरण ग्रामीण-स्त्री का नया जागरण है जो उसे इक्कीसवीं सदी की नारी बनाता है। देवी दल की स्थापना भी चंदावती का सपना है क्योंकि स्त्रियों की एकता ही उन्हें मर्द के अत्याचारों से मुक्त करवा सकती है। उसके लिए दुनिया भर की स्त्रियाँ देवी हैं जिन्हें जागृत करने की आवश्यकता है। वह अपने भाई संकर से कहती है- दुनिया भरेकि मेहेरुआ हमरे लेखे देबी आँय। वुइ जिन्दगी भरि अदमिन क कुछ न कुछ दीनै करती हैं, जेतना अदमी उनका देति है वहिके बदले वुइ हजारन गुना लउटाय देती हैं। वुइ अदमी क पैदा करै वाली हैं। अदमी हरामजादा वहेक बेज्जत करति है, वहेक नंगा कीन चहति है- वहे महतारी बिटिया के नाम ते याक दुसरे क गरियावति है। अब जमाना बदलि गवा है अब हमरे देस कि रास्ट्रपति प्रतिभा देबी सिंह हैं।” (पृ. 73)   
चंदावती के विरोध में गाँव का मुखिया, सारा सवर्ण समाज, उसका देवर और उसका परिवार, पुलिस व्यवस्था सब शामिल हो जाते हैं लेकिन अपनी बुद्धि और साहस के चलते चंदावती हार नहीं मानती। उसका मानना है कि दुनिया की हर स्त्री की एक ही जाति है- स्त्री जाति जिसके पास छिपाने को कुछ भी नहीं है। सभी एक तरह की दुख-तकलीफ़ सहती हैं, सभी एक तरह अपना घर-परिवार छोड़कर दूसरे के घर में अपनी जगह बनाती है और सब एक तरह से ही बाल-बच्चा पैदा करती हैं, और सब एक तरह ही पति की लातें खाती हैं। इसलिए वह अपने गाँव की स्त्रियों को एक जगह इकट्ठा करती है और उन्हें जागृत करती है। वह उन्हें जगाने के लिए एक गीत बनाती है जो देवी दल का स्वर बन जाता है-
गुइयाँ मोरी डटिकै रहौ
गुइयाँ मोरी बचिकै रहौ दर्द अपन आपस मा खुलि कै कहौ।  (पृ. 101)  



लेकिन चंदावती और कुंता दोनों का साहस भी उन दोनों की हत्या को रोक नहीं पाता है। उन्हें नहीं पता था कि उनका सामना पेशेवर हत्यारों से है जो किसी भी तरह से उन्हें छोड़ने वाले नहीं। धन-संपत्ति, जायदाद आदि के लिए तो लोग कुछ भी कर सकते हैं। ऐसे में छोटकऊ और सिवपरसाद अपने घर की स्त्री चंदावती के साहस से बौखलाकर उसके ऊपर हमले पर हमले करते हैं और अंत में कुंता फूफू के साथ उसकी हत्या तक करवा देते हैं। लेकिन जो काम चंदावती जीते-जी नहीं कर सकी, वो उसकी हत्या ने कर दिया। चंदावती के हत्यारे न सिर्फ़ पकड़े गए, बल्कि उसके हक की संपत्ति पर देवी दल, स्कूल और स्त्रियों के स्वरोज़गार केन्द्र की स्थापना भी हुई।



चंदावती उपन्यास को न सिर्फ़ ग्रामीण-स्त्री विमर्श के लिए याद किया जाएगा वरन् अपनी सांस्कृतिक विविधता के वर्णन के लिए भी भुलाया नहीं जा सकता। इसमें अवध के गाँवों की संस्कृति जीवंत रूप से अभिव्यक्त हुई है। विवाह में होने वाले नकटौरा का वर्णन बड़ा ही अद्भुत बन पड़ा है। लोकाचार भी इसमें आज की स्थिति के अनुसार दिखाई देते हैं। आज के गाँवों में राजनीति किस तरह अपना दखल देने लगी है, इसमें पता चलता है। छोटे से काम के लिए मंत्री निरहू परसाद की सिफ़ारिश लगवाना किस तरह घातक हो सकता है, चंदावती उपन्यास में पढ़ा जा सकता है। पुलिस, पत्रकार, मंत्री और प्रधान मिलकर किस तरह एक नई व्यवस्था का निर्माण कर रहे हैं- इस कृति में बड़ी सच्चाई से प्रदर्शित होता है। सबसे बड़ी बात यह कि इक्कीसवीं सदी में भारत में जाति व्यवस्था के प्रश्न अभी भी वैसी ही जड़ें जमाए हुए हैं, जो आज़ादी से पहले थे। भले ही चंदावती ने अंतरजातीय विवाह किया था, वो भी तीस साल पहले लेकिन अभी भी जाति के समीकरण अपनी पूरी शक्ति के साथ ज़िंदा हैं। ऐसा नहीं होता तो पत्रकार रुपए लेकर प्रधान ठाकुर रामफल का नाम रिपोर्ट से निकाल न देता। रामफल पत्रकार से कहता है कि- तुमरी बनायी खबरि क्यार माने होति है। सिवपरसाद, बिनोद औ छोटकौनू का कसिकै लपेटि देव। सब सार चूतिया बाँभन आँय। अपनी बिरादरी क्यार- माने हमार ध्यान राखेव।” (पृ. 122) । इस पर पत्रकार कहता है- “दादा तुम तो मजबूर कै दीन्हेव।” (वही) इससे पता चलता है कि जाति का दबाव अभी भी समाज में बहुत अधिक है जिसका अच्छा-बुरा प्रभाव समाज पर हमेशा पड़ता है।     
एक और आकर्षण है इस उपन्यास का कि यह बेहद पठनीय है और पूर्वदीप्त शैली का उपयोग करता है। चंदावती को बार-बार याद आता है कि किस तरह उनका विवाह हुआ था हनुमान शुक्ल के साथ। उपन्यास वर्तमान और अतीत के बीच कथा को इस तरह सुनाता है जैसे किस्सा सुना रहा हो। और इस किस्सागोई में वर्तमान और अतीत के सभी नाते-रिश्ते, संबंध उघड़ते चले जाते हैं। हर बात कहने के लिए कथाकार के पास कोई न कोई नया पात्र है जो अपनी स्टाइल में उस बात को बताता है। लेकिन इस वर्तमान और अतीत की लुका-छिपी के बीच कथारस में कोई बाधा नहीं आती है। कहीं-कहीं चंदावती का स्वप्न प्रवाह भी है, जब वो अपने अतीत की गहराइयों में खो जाती है। गाँव में स्त्रियों को जागृत करने के लिए लोक गीतों का सहारा लिया गया है। इतना ही नहीं, ग्रामीण संस्कृति में रची बसी गालियों का प्रयोग भी इसकी भाषा को और अधिक आकर्षक और प्रामाणिक बना देता है। छुतेहर, भतारकाटी, दहिजार आदि गालियाँ अश्लील नहीं लगती बल्कि लोक भाषा को जीवंत बना देती हैं।
ये उपन्यास स्त्री की कहानी तो है ही, पुरुष-सत्ता के षड़यंत्रों को समझने का एक सार्थक औजार भी है। गाँव में पुरुष-सत्ता को चुनौती देने का काम किसी स्त्री ने शायद ही किया हो। चंदावती गांव की पुरुषवादी व्यवस्था में अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराती है और उसमें सार्थक परिवर्तन भी लाती है, भले ही उसे अपनी कुरबानी देनी पड़ती है- यह इस कृति की सबसे बड़ी विशेषता है। इसका गद्य इसकी ऊर्जा है जो कहीं भी बाधित नहीं होता और बिना रुके पढ़ा जाता है। नई रोसनी और चंदावती के बाद भारतेन्दु से अवधी उपन्यास परंपरा को और भी आगे बढ़ाने की उम्मीद है। हिंदी कहानी के शीर्ष हस्ताक्षर शिवमूर्ति का कहना है- यदि चन्दावती हिन्दी या किसी अन्य भाषा मे लिखी जाती तो बेस्टसेलर बुक होती।  
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संपर्कः अध्यक्ष, हिंदी विभाग एवं संयोजक पत्रकारिता एवं जनसंचार, मणिबेन नानावटी महिला महाविद्यालय, विले पार्ले (प), मुंबई-400056. मोबाइलः 09324389238. ईमेल: katyayans@gmail.com   

समीक्षा २.
(विनोद कुमार-महमूदाबाद )






समीक्षा 3(डा.गुणशेखर ,सूरत )