गुरुवार, 29 अक्टूबर 2009

कजरी विशेषांक

avadhajyoti

चिरैया के संपादक कइहाँ अवध-ज्योति क्यार तजा अंक सितंबर-2009 मिला । भइया रामबहादुर मिसिर क धन्यवाद। कजरी गीतन क्यार बडा पुरान इतिहास हइ। यहि अंक क्यार अतिथि संपादक डाँ.सियाराम ‘सिन्धु’ बधाई के हकदार ह्इ। अवध मा कजरी
गीतन के बिसय मा यहि अंक मा बिसेस लेख दीन गवा हइ।यहि लाजवाब जानकारी खातिर अवध-ज्योति परिवार का सुभकामना।यहि पत्रिका क्यार पता ई तना हइ----------


संपादक-डाँ.रामबहादुर मिश्र
अवध-ज्योति (त्रैमासिकी)
अवध भारती समिति,
नरौली,बीजापुर,हैदरगढ
बाराबंकी -227301
फोन-09450063632,09455189345

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2009

avadhee loka

अवधी लोक:एक परिचय
*भारतेन्दु मिश्र

अवध का लोक जीवन रीति-रिवाजो,संस्कारों ,ऋतु गीतों आदि के माध्यम से चीन्हा जा सकता है। धान –पान और मान की धरती है अवध की। यह अवध की ही धरती है जहाँ दरबार मे आने पर राजा स्वयं कवि को सम्मानित करने के लिए पान का जोडा पेश करते थे —‘ताम्बूलमासनद्वय च लभते य: कान्यकुब्जेश्वरात।’ यह उक्ति संस्कृत के ‘नैषधीयचरित’ महाकाव्य के रचयिता महाकवि श्रीहर्ष के सन्दर्भ मे प्रचलित है। कन्नौज के राजा विजयदेव के दरबार मे जब महाकवि श्रीहर्ष पधारते थे तब वे उनका स्वागत पान के बीडे से करते थे। अत: मान का पान अवध मे बहुत माने रखता है।
अवधी लखनऊ,कानपुर,उन्नाव,हरदोई,शाहजहानपुर,इटावा,कन्नौज,फर्रुखाबाद, फतेहपुर,रायबरेली, सुल्तानपुर, जौनपुर ,प्रतापगढ, इलाहाबाद,सिद्धार्थनगर,बाराबंकी, सीतापुर लखीमपुरखीरी ,गोण्डा,बलरामपुर,अम्बेडकरनगर, बहराइच,फैजाबाद, कौशाम्बी ,बान्दा, चित्रकूट ,गोरखपुर,कबीरनगर, आदि जनपदो मे रहने वाले कोटि-कोटि कंठों की मातृभाषा है।यह अलग बात है कि अवध का आदमी मूलत: जुझारू किसान है। यहाँ का आदमी शांत और संकोची स्वभाव का है। कृषि संस्कृति और गृह रति ही अवध के लोकाचार मे प्रकट होती है।अक्सर मूर्खता की हद तक संकोच मनुष्य की प्रगति मे बाधक हो जाता है।इस लिए भोजपुरी भाषी क्षेत्र की तुलना मे यहाँ का आदमी जल्दी से संगठित नही हो पाता।आमतौर पर अवध का आदमी प्रतिक्रियावादी भी नही है।
नौटंकी,रामलीला,रासलीला,कीर्तन,आल्हा,सफेडा ,रतजगा,जैसी लोकनाट्य परम्पराओ के साथ ही तुलसी और जायसी की इस धरती मे लोक गीतो की लम्बी परम्परा है। यही धरती है जहाँ अयोध्या है ,चित्रकूट है,जो रामकथा की व्यापकता की साक्षी बनी हुई है। राम का शील संकोच यहाँ की जातीयता मे शामिल है। शबरी और राम के मिलन का एक प्रसंग देखिये--
आजु बसौ सबरी के घर रामा।
बेर मोकइया क भोगु लगावै
अउरु नही सबरी के घर सामा।
कुस कै गोदरी सेज बिछउना
लोटि-पोटि परभू करै बिसरामा। आजु..।
सदियों प्राचीन इस लोकगीत मे भी शबरी के संकोच का निरूपण ही इसे मार्मिक बनाता है कि शबरी के संकोच के बावजूद राम उसके घर आ जाते हैं,और बेर तथा मोकइया जैसे अतिसामान्य समझे जाने वाले फल का भोग करते हैं।एक और संकोच का मार्मिक चित्र देखिये तुलसी कहते है--
जल को गये लक्खन है लरिका परिखौ पिय छाँह घरीक हुइ ठाढे।
पोछि पसेऊ बयारि करौं अरु पाँय पखारिहौ भूभुरि डाढे।
तुलसी रघुबीर प्रिया स्रम जानिकै बैठि बिलम्बलौं कंटक काढे।
जानकी नाह को ने ह लख्यो पुलक्यो तनु बारि बिलोचन बाढे।
सीता यहाँ वनप्रदेश मे यात्रा करते हुए राम के साथ जा रही है। वे थक गयी हैं। राम से अपनी थकान का भेद जाहिर नही करना चाहतीं परंतु बहाने बनाकर उन्हे रोक लेती हैं। राम बिना कुछ कहे सीता की मनोदशा का
अनुमान कर लेते हैं और चुपचाप बैठकर देर तक अपने पैर के काँटे निकालने का उपक्रम करते रहते हैं। अवध मे नर नारी के बीच इस प्रकार का संकोच दाम्पत्य की सहज व्यंजना मे आदर्श माना जाता है। अवध का लोक जीवन ऎसा है कि जहाँ अविवाहित युवक-युवतियाँ ही चोरी-छिपे नही मिलते अपितु पति-पत्नी को भी चोरी छिपे मिलना पडता है।यहाँ तक कि पुरुष अपने पुत्र को भी अपने बडे बुजुर्गों के सामने गोद मे नही उठाता,भले ही शिशु बिलख रहा हो और उसकी माता किसी अन्य गृहकार्य मे व्यस्त हो। यदि कोई ऎसा करता है तो प्राय: अन्य सभी उस व्यक्ति का मजाक बना देते हैं,और उस मेहरा[स्त्रैण्य स्वभाव वाला] कहकर चिढाते है। कई एसे लोक गीत हैं जो हैं तो नारी संवेदना के किंतु वे गाये पुरुषो द्वारा जाते हैं।अधिकतर ऎसे गीतो मे नारी की व्यथा,उसका शील –संकोच,शिकवा शिकायत ,मान –मनउव्वल आदि की अभिव्यक्ति होती है। देखिये एक पुरुष नारी की वेदना को किस प्रकार गाता है-
लरिकइयाँ के यार संघाती,
जोबन पै लगाओ न घाती, पिया कै मोरे थाती।
नाहक जुलमी जोबनवा तू आयेव सांसति हमरे जियरा कै करायेव
अब लिखबै ससुर घर पाती लूटै आवै चोर दिन राती
पिया कै मोरे थाती।...
अवध के लोक गीतों की विभिन्न छवियाँ हैं,जिनमे सबसे अधिक गीत कथात्मक हैं,जो रामकथा की लोकवादी छवियाँ प्रस्तुत करते हैं।ऋतुगीत हैं,बारहमासा हैं,जातीय गीत हैं जिनमे धोबियाराग,कुम्हारगीत,गडरियागीत आदि विभिन्न जातियो के गीत अपने लोकसौन्दर्य की छवियो के साथ आज भी विद्यमान हैं-
मोटी-मोटी रोटिया पोयो री बरेठिनि भोरहे चलिबे घाट,
बरेठिन, भोरहे चलिबे घाट।
तीनि चीज ना भूल्यो बरेठिन हुक्का-चिलम औ आगि,
बरेठिन हुक्का-चिलम औ आगि।
तोरी मोरी जोडिया जमी बरेठिन
भोरहे चलिबे घाट,
बरेठिन,भोरहे चलिबे घाट।
हुक्का फोरि कै फुक्का बनइबे पियेव गदहा कै सींग,
बरेठा पियेव गदहा कै सींग।
इस एक लोक गीत मे ही धोबी दम्पति के बीच की नोक झोंक बहुत मार्मिक बन गयी है।यहाँ संकोच नही है। इन लोक गीतों को पढने से यह भी ज्ञात होता है कि अवध की सवर्ण स्त्रियाँ या कि सवर्ण जातियाँ इस संकोच और लोकाचार से अधिक पीडित रही हैं,न कि असवर्ण जातियाँ। ये असवर्ण जातियाँ भी लोक सौन्दर्य के अधिक निकट रही हैं।सोहर,बनरा,कजरी,सावन,होरी,फाग,गारी,कृषिगीत-निकउनी,बोउनी आदि गाये जाने की लम्बी परम्परा अवध मे रही है। इन लोकगीतों मे जीवन का अनंत श्रम सौन्दर्य भरा पडा है। असल मे लोकरीतियो की हमारी सुन्दर परम्पराये तथाकथित विकासवाद और प्रगतिवाद के नीचे या पीछे दबकर रह गयी हैं। हम अपना घर और गाँव पीछे छोडकर विश्वग्राम की ओर बढ गये हैं। राम का आदर्श रामकथा के संस्कारों के साथ-साथ आज भी किसी न किसी रूप मे शील संकोच की भाँति लोक मे प्रतिफलित होता दिखाई देता है।यही कारण है कि अवध का आम आदमी दिल्ली,मुम्बई,कोलकाता जाकर वहाँ की भाषा तो अपना लेता है किंतु अपनी अवधी मे बतियाने मे उसे शर्म और संकोच का अनुभव होता है। अवध का प्रवासी अपने अवधी लोक का सौन्दर्य वहीं घर मे धर आता है,और अपने अवधी संकोच मे जीवन बिता देता है। विश्वग्राम की व्यापक अवधारणा मे अवध के प्रबुद्धजनों को अपनी लोकचेतना की आग को बचाकर रखना चाहिए।
(मड़ई , के लिए संपादक -कालीचरण जी छात्तीस गढ़ वाले )

सोमवार, 24 अगस्त 2009

नई रोसनी :अवधी उपन्यास

---------- Forwarded message ----------
From: Arvind Kumar
Date: ०३-०८-२००९ २:
भारतेंदु जी

अ भा हिंदी विमर्ष पर आप के उपन्यास का परिचय आ गया है. दो और एक दो जगह भी आएगा.

From: hindi-vimarsh@googlegroups.com [mailto:hindi-vimarsh@googlegroups.com] On Behalf Of Arvind Kumar
Sent: Monday, August 03, 2009 8:23 AM
To: hindi-vimarsh@googlegroups.com
Subject: {हिंदी-विमर्श:1488} Hindi ki Lokbhashaen aur Avadhi ka pehla adhunik upanyas

प्रिय मित्रो

हिंदी की लोकभाषाएँ अपने आप में स्वतंत्र भाषाएँ हैं. यूरोप के कई देश हैं जिन की आबादी हमारे ऐसे भाषा क्षेत्रों से बहुत कम हैं. लेकिन उनके मुक़ाबले, जहाँ तक आधुनिक गद्य का सवाल है, सचमुच पिछड़ी हैं. उदाहरण के लिए ब्रजभाषा या अवधी---ब्रज अभी तक राधा कृष्ण काव्य से और अवधी रामचरित से आगे नहीं बढ़ पा रहीं. इन में कुछ फ़िल्में भी बनीं, पर बात वहीं रुक गई. इन क्षेत्रों में छपने वाले दैनिक मासिक पत्र अपनी स्थानीय भाषाओं को सप्ताह तो क्या महीने में भर में निज भाषा में राजनीति सामाजिक या तकनीकी विषयों पर एक भी पन्ना नहीं देते. तो उपयुक्त माध्यम के अभाव में आधुनिक गद्य का विकास अवरुद्ध हो जाता है.
सच यह है कि इन में गद्य और साथ साथ शब्दावली के विकास से ये भीसमृद्ध होंगी और हिंदी भी. मैं समझता हूँ कि जागरूक लोगों को इस मामले में आगे आना चाहिए और जब भी मौक़ा हो, समाचार पत्रों में स्थानीय भाषाओं के समावेश की आवश्यकता को प्रचारित करना चाहिए.यह मेल भेजने का तत्काल कारण है मेरे मित्र और सुपरिचित भारतेंदु मित्र के अवधी उपन्यास नई रोसनी का प्रकाशन. सुंदर गद्य और सुंदर कथ्य. इस के बारे में जानकारी नीचे चिपका रहा हूँ. हो सके तो स्थान दें—

नईरोसनी” :अवधी उपन्यास
किसी भी भाषा की समृद्धि उसके गद्य के विकास पर
आधारित होती है। अवधी मे गद्य का प्रयोग प्राय: नगण्य ही रहा है। ‘ नई रोसनी’ भारतेन्दु मिश्र द्वारा लिखा संभवत: पहला अवधी उपन्यास है। अवधी मेँ न तो कोई चैनल है और न कोई अखबार । लखनऊ से प्रकाशित होने वाले तमाम दैनिक समाचार है किंतु अवधी मे एक पृष्ठ की भी सामग्री नही मिलती । लखनऊ,कानपुर,फैजाबाद आदि जगहोँ से निकलने वाले अखबारोँ के साप्ताहिक परिशिष्ट मेँ भी कुछ स्थान अवधी के लिए निर्धारित होना चाहिए। 96 पृष्ठोँ मेँ पेपरबैक संस्करण वाले इस उपन्यास का मूल्य केवल रु.60/ है। बहरहाल इस पुस्तक मेँ आधुनिक अवधी गद्य का सुन्दर प्रयोग किया गया है। इसका प्राप्ति स्थान इस प्रकार है:
कश्यप पब्लिकेशन
बी-48/यूजी-4,दिलशाद एक्सटेंशन-2, डी एल एफ,गाजियाबाद -05
kashyappublication@yahoo.com

प्रिय भाई
हिंदी की लोकभाषाएँ अपने आप में स्वतंत्र भाषाएँ हैं. यूरोप के कई देश हैं जिन की आबादी हमारे ऐसे भाषा क्षेत्रों से बहुत कम हैं. लेकिन उनके मुक़ाबले, जहाँ तक आधुनिक गद्य का सवाल है, सचमुच पिछड़ी हैं. उदाहरण के लिए ब्रजभाषा या अवधी---ब्रज अभी तक राधा कृष्ण काव्य से और अवधी रामचरित से आगे नहीं बढ़ पा रहीं. इन में कुछ फ़िल्में भी बनीं, पर बात वहीं रुक गई. इन क्षेत्रों में छपने वाले दैनिक मासिक पत्र अपनी स्थानीय भाषाओं को सप्ताह तो क्या महीने में भर में निज भाषा में राजनीति सामाजिक या तकनीकी विषयों पर एक भी पन्ना नहीं देते. तो उपयुक्त माध्यम के अभाव में आधुनिक गद्य का विकास अवरुद्ध हो जाता है.
सच यह है कि इन में गद्य और साथ साथ शब्दावली के विकास से ये भीसमृद्ध होंगी और हिंदी भी. मैं समझता हूँ कि जागरूक लोगों को इस मामले में आगे आना चाहिए और जब भी मौक़ा हो, समाचार पत्रों में स्थानीय भाषाओं के समावेश की आवश्यकता को प्रचारित करना चाहिए.

यह मेल भेजने का तत्काल कारण है मेरे मित्र और सुपरिचित भारतेंदु मित्र के अवधी उपन्यास नई रोसनी का प्रकाशन. सुंदर गद्य और सुंदर कथ्य. इस के बारे में जानकारी नीचे चिपका रहा हूँ. हो सके तो स्थान दें—


“नई रोसनी” :अवधी उपन्यास
किसी भी भाषा की समृद्धि उसके गद्य के विकास पर
आधारित होती है। अवधी मे गद्य का प्रयोग प्राय: नगण्य ही रहा है। ‘ नई रोसनी’ भारतेन्दु मिश्र द्वारा लिखा संभवत: पहला अवधी उपन्यास है। अवधी मेँ न तो कोई चैनल है और न कोई अखबार । लखनऊ से प्रकाशित होने वाले तमाम दैनिक समाचार है किंतु अवधी मे एक पृष्ठ की भी सामग्री नही मिलती । लखनऊ,कानपुर,फैजाबाद आदि जगहोँ से निकलने वाले अखबारोँ के साप्ताहिक परिशिष्ट मेँ भी कुछ स्थान अवधी के लिए निर्धारित होना चाहिए।
96 पृष्ठोँ मेँ पेपरबैक संस्करण वाले इस उपन्यास का मूल्य केवल रु.60/ है। बहरहाल इस पुस्तक मेँ आधुनिक अवधी गद्य का सुन्दर प्रयोग किया गया है। इसका प्राप्ति स्थान इस प्रकार है:
कश्यप पब्लिकेशन
बी-48/यूजी-4,दिलशाद एक्सटेंशन-2, डी एल एफ,गाजियाबाद -05
kashyappublication@yahoo.com


शुभ कामना सहित
आप का

अरविंद
सी-18 चंद्रनगर (पूर्वी दिल्ली के विवेक विहार और योजना विहार के पास)
गाज़ियाबाद 201011
टेलि - 9312760129 - लैंडलाइन (0120) 4110655

samantarkosh@gmail.com

मंगलवार, 7 जुलाई 2009

दुइ गीत:माई जी

अवधी अकादमी के संचालक
अउरु –बोली बानी क्यार संपादक : जगदीश पीयूष के दुइ गीत

एक
बरैँ अँधरू पड.उनू
चबाँय माई जी।
पइसा आवा सरकारी पुला बनै कै तयारी
होय हेरा फेरी जाने ना
खोदाय माई जी।

आई एमेले कै निधि
खाइ लेइ कौन विधि
गवा अपनौ निमरुआ मोटाय माई जी।
होय अन्न कै खरीद
घाल मेल कै रसीद
मिलि बाँटि-बाँटि खाँय डेकराँय माई जी।
आवे जब जब धन
बनि जाय करधन
गोरी पतली कमरिया पिराय माई जी।

दो
कुर्ता खादी का चौचक ताकैँ गाँधी जी भौचक
होइगे घरे घरे नेतवे दलाल माई जी।
चाटैँ राजनीति कै चाट
रोजै बदलैँ धोबी घाट
धक्का मुक्की होइगा देसवा धमाल माई जी।

चारिव ओरी मारामारी
जेका देखा ठेकेदारी
होइगे मंत्री जी कै पूत मालामाल माई जी।
अफसर होइगे बेइमान
नौकर चाकर भरे गुमान
वोटवा हुइगा हमरी जान- क बवाल माई जी।
करै धीरे धीरे हमका हलाल माई जी॥

(संपर्क: संपादक –बोली बानी,अवधी अकादमी,गौरी गंज,सुलतान पुर उ.प्र.फोन:09415137521)

गुरुवार, 4 जून 2009

आजु केरि लडकी

ख़ुरपा हंसिया थामिस
घासौ छीलिसि
लकडी बीनिसि
बथुई ख़ोंटि लाई
भाई- बहिनिया की अंगुरी पकरि कै
लंबा रस्ता काटिसि
जली रात-दिनु चूल्हे मा
लकडी की नाई
जगह न पायेसि तबहू वा
ई दुनिया मा
भीड मा रहति है चुपचाप
अकेले मा मुस्काति है
करति है बातैं आसमान ते
पंछी है परवाज है
हवा केरि रवानी है
चुटकी भर पियारु मा
लडकी देवानी है
ख़टकति यहै सबु
अब सबकी आंख़िन मा
कोख़ि मा मारी जाय रही है
दुख़िया।


डां॰ ग्यानवती दीक्षित
169,प्रतिभा निवास
रोटी गोदाम
सीतापुर, उ॰प्र॰

मंगलवार, 2 जून 2009

शुक्रवार, 29 मई 2009

छपरा कस उठी

जुगु बदलि गवा है।अब कउनेव ट्वाला मा जाति बिरादरी वाले याक साथ बइठै का तयार नाई हैं। जीके तीर पइसा है –वहेकि ठकुरई। उनका छपरा तौ जस पहिले उठति रहा है तस अबहूँ उठी मुला गरीबन क्यार छपरा को छवाई? जो कउनिव तना ते छाय ले तो फिरि ऊका उठावै वाले जन कहाँ ते अइहैं।
गरीबी हटावति हटावति कइयौ सरकारै हटि गयीं। गरीब दुखिया जहाँ खड़े रहैं हुआँ ते अउरु पाछे हटि आये ,मुला गरीबी न अब लौ हटी है न जल्दी हटै वाली है। अमीरी गरीबी के पाटन मा आपसदारी धीरे-धीरे पिसी जाय रही है- तीका कोई इलाजु नाई है।
अब जब नोटन ते रिस्ता जुड़िगा है तो बेइमानी-बदमासी औ मक्कारी करै मा जो साथु दे ,वहै रिस्तेदार है-वहे ते आपसदारी है। छपरा बिनु आपसदारी ना तौ छावा जाय सकी न उठावा जाय सकी औ –जो कहूँ आगि लागि जाय तो बुझावौ न जाय सकी। हमरी लरिकई मइहाँ सब याक दुसरे क्यार छपरा छवावै औ उठवावै जाति रहैं। अबहूँ छपरा उठवावै-क न्यउता आवति है मुला अब टाला –टाली कइकै सब अपन जिउ चोरावति हैं। जीके हाथेम लाठी है तीके सगरे काम बनि रहे हैं। जीके हाथेम नोट हैं वहूके सब काम निपटि रहे हैं। कुछु जने तौ तिकड़म ते आपन काम निकारि रहे हैं, तेहूँ गाँव मा अइसन मनई जादा हैं जिनके काम कउनिव तना नाई हुइ पाय रहे हैं। अइसे टेम मइहाँ उनका छपरा कस उठी?
अब न उइ सैकरन बाँसन वाली बाँसी रहि गयी हैं, न छपरा खतिर बाँसै जोहाति हैं। फूसु धीरे-धीरे फुर्रु हुइ गवा है।हाँ ऊँखन कै पाती औ झाँखर मिलि जाति हैं। बड़क्के किसान तौ पक्की हवेली बनवाय रहे हैं छोटकये कच्ची देवालन पर लेसाई लौ नाइ कइ पाय रहे हैं। मँजूरी -धतूरी ते जो संझा तके लोनु रोटी मिलि जाय तौ जानौ बड़ी भागि है। कंगाली के साथ मँहगायी मुर्गा बनाये है। लकड़ी कटि-कटि राती-राता सहरन मा जाय रही है। फारेस्ट वाले खाय पी कै सोय रहे हैं। हमका तुमका तौ थुनिहा औ चियारिव नाई मिलै वाली हैं। बाता मइहाँ पगही बाँधे छपरा कै दिन रुकी, अरे रुकी कि ठाढै न होई।
अइसी वइसी बइठै ते , बीड़ी फूँकै ते या सुर्ती मलै ते कुछु काम बनै वाला नाई है। लरिकईं –म जब छपरा उठवावै जाइति रहै तौ बड़ा जोसु रहै, गाँव केरी ऊँची नीची सब जातिन क्यार अदमी आवति रहै।“अउरु लगा दे हैंसा, जोर लगा दे हैंसा..। पुरबह वार खँइचो रे, दखिनह वार थ्वारा रेलि देव”- ई तना के जुमला यादि आवति हैं। तब मालुम होति रहै कि गाँव ट्वाला सब अपनै देसु है।
तब जहाँ चहौ तहाँ चट्ट –पट्ट छपरा धरि दीन जाति रहै। अब न तौ रमजानी अपने ट्वाला ते अइहैं, न सुच्चा सिंह न रामपालै केरि उम्मेद है। अइसे बुरे बखत मइहाँ कहाँ मूड़ु दइ मारी।
छपरा जीमा कइयौ सिकहर लटके होति रहैं, कहूँ-कहूँ छोटकई चिरैया आपन घुरुघुच्चु बनउती रहैं, जिनके ऊपर कबहूँ लउकी-कदुआ केरि फसल मिलति रहैः जी पर बिलइया टहलती रहैं – जीके तरे जिन्दगी मउत ,दीन-दुनिया केरि सब बतकही होति रहै – जीके तरे घरी भरि बइठि कै राहगीरौ जुड़ाति रहै- सँहिताति रहै, जहाँ दुपहरिया मा कबौ किस्सा किहानी,कबौ सुरबग्घी, औ कबहूँ कोटपीस ख्याला जाति रहै-अब उइ दिन कहाँ? अब जब पियारु दुलारु- मोहब्बति औ भइयाचारु नाई रहिगा है तो छपरा छावा जाय चहै न छावा जाय। उठवावा जाय चहै न उठवावा जाय हमरी बलाय ते।
( -“कस परजवटि बिसारी” से)